अपना भारत

आप को क्रांति तो चाहिए लेकिन दूसरों के कंधों पर चढ़कर!

यह एक स्वस्थ समाज के लिए ठीक नहीं है मित्रों!

यह ठीक है कि हर महीने बैंक को मंहगे ईएमआई जाने हैं। यह भी ठीक है कि इतने बड़े स्टाफ के खर्चे निकालने हैं। यह भी ठीक है कि आप ने डाक्टरी की पढ़ाई में लाखों-लाख खर्च कर डालें हैं। यह भी ठीक है कि अस्पताल की अट्टालिकाओं को बढ़ाना है। अलग-अलग रोग के विशेषज्ञों को हायर करना है। नित नए सुविधाओं को बढ़ाना है,
लेकिन क्या यह ठीक है कि सबकुछ इतनी जल्दी कर देना है! आप के पास समय इतना कम है?
अरे मां के गर्भ से जन्म लेने वाला बच्चा भी… परिपक्व होने में 9 महिने.. लेता है। फसलों को भी पकने में एक पूरा मौसम चक्र लगता है। जाड़ा, गर्मी और बरसात को आने में भी क्रमशः मौसम चक्र लगता है। आप के चाह लेने मात्र से रात के समय, दिन तो नहीं उग जाएगा। दिन निकलेगा तो सूर्योदय के साथ ही ।
मित्रों!जब प्रकृति अपने नियमों को पालन करती है, अपने मौसम चक्र और समय का पालन करती तो, फिर आप को इतनी जल्दीबाजी क्या है अमीर बनने का..? पैसे बनाने की लत का.. हवस बन जाने का .? आप की इस जल्दीबाजी और हवस ने आप को कितना अलग-थलग और अनैतिक बना दिया है। कभी सोचा भी है। कभी भूलकर भी तो आईना देखिए, और हो सके आज ही देखिए, उस आईने में अपने आप को देखिए और पूछिए कि ! जो कुछ और जैसे कर रहे हैं, आप ने इसी बात की मेडिकल ओथ ली थी? जवाब आप की अन्तर्रात्मा जरूर देगी। जरा सोचिए आप के इस आचरण से उन चिकित्सकों पर क्या गुजरती होगी, जो अपने महान चिकित्सा उद्देश्य को लेकर आज भी बेहद ईमानदारी से प्रैक्टिस करते हैं। जब जनता किंही चंद लोगों की वजह से पूरे चिकित्सक समाज को ग़लत निगाह से देखने लगती है।
यह तो स्वत: नियंत्रण का विषय है। क्या होगा, अगर आप की अट्टालिकाओं को बनने में थोड़ा और समय लग जाएगा। आप की सुविधाएं थोड़ी देर से बढ़ेगी। आप की मंहगी गाड़ियां थोड़ी देर में आएंगी,थोड़े कम स्टाफ से ही काम चला लेंगे। विदेश यात्राओं में थोड़ी कटौती हो जाएगीं। थोड़ा संघर्ष बढ़ जाएगा!
लेकिन इस पाप का भार मन और मस्तिष्क पर तो नहीं रहेगा कि हम प्रैक्टिस करते-करते जनता की निगाह में कब इतने बदल गयें। कभी मरघट का डोमडा तो नहीं बनें, जिस तरह गिद्ध लाशों को देखकर खुश होते हैं, हममें पेशेंट को देखते हुए यह भाव तो न आएं। हमने लाशों को रखकर सौदा तो नहीं किया। हमने तो वहीं किया जो धरती के भगवान को करना था। यकीन मानें सोते समय एक अच्छी नींद जरूर आएगी। आप के बच्चे नेक और ईमानदार होगें। आप को किसी अदालत में सिर नहीं झूकाना पड़ेगा। आप की गिनती मुर्दाखोरों में नहीं होगी। आप उस महान विरासत की परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं, जिसमें डाक्टर को इंसानों ने धरती का भगवान बना दिया!
और हां, कल की मेरी पोस्ट पर अस्पताल का नाम पूछने वाले उत्सुक और बेचैन आत्माओं, अगर आप इतने जागरुक होते तो कोई अस्पताल लाशों को वैंटीनेटर पर रखकर पैसे नहीं बना पाता। नये-नये युवा समाज सुधारक और समाजसेवी नहीं पैदा हो जाते, जिन्हें समाज का ‘स’ भी पता नहीं है। केवल पैसे के दम पर समाजसेवी बन जा रहे हैं। इन नव धनाढ्यों से सावधान रहते। पिछले समय के अनुभव इस बात के संकेत जरूर हैं कि जनता की लड़ाई आप लड़िए और जब आप को जरूरत होगी तो … सभी अवसरों की तलाश करने लगेंगे। यह तो पारस्परिक सहयोग का संबंध है समाज और उसके प्रतिनिधि के बीच। हमने घटना बता दिया है। उसकी तह में आप भी जाइए। हर बार पत्रकार से ही अपेक्षा क्यों कर रहे हैं? पिछली बार किस पत्रकार और एक्टिविस्ट के पक्ष में खड़े हुए थे यह भी तो जरा सोचो। आप को सारी क्रांति चाहिए, आप की लड़ाई दूसरे लड़ें और आप सोशल मीडिया पर कमेंटबाजी तक सीमित रहेंगे। ऐसा भी कहीं होता। ऐसे तो नहीं चलेगा भाई! माफ़ करिएगा!!
(खेद के साथ…!)
-डॉ अरविन्द सिंह

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