खुद के सपनों के रफ्तार के लिए, उसके पंख कुचल डाले
■ रोशनी जायसवाल
बेटी थी वो,
अपने मां कि,
लाडली थी वो,
अपने पिता की,
गुड़िया थी वो,
अपने चाहने वालों कि,
परी थी वो,
खुद के सपनों के रफ्तार के लिए,
उसके पंख कुचल डाले,
कुछ हैवानों ने अपनी भूख मिटाने के लिए।
शहजादी थी वो,
अपनी छोटी सी कुटिया के लिए,
शुरू कि क्या तुमने राजनीति,
वो मर कर भी बट गयी पिछड़ी जाति में कहीं,
जो हैवान है वो,
जश्न मना रहा खुलेआम मे कहीं,
जो चिखी चिल्लाई वो,
अब लोगों के तमाशे का राज है,
तुमने तो वोट बैंक खेल डाला,
पर वो देख रही इन्साफ की राह है।

