रविश ने किरायेदार, मकान मालिक व किरदार में NDTV छोड़ अपनी किरदार बचाने की कोशिश की
मकान मालिक, किराएदार व किरदार में रवीश कुमार पत्रकारिता में अपने हिस्से के बटोरे गए किरदार को लेकर एनडीटीवी से हुए अलग
आनन्द कुमार….
किरदार, किराएदार व मकान मालिक! किरदार तो व्यक्ति के मृत्यु के बाद ही दफन हो पाएगा लेकिन किरदार शब्दों की अभिव्यक्ति से है या कुछ अलग भूमिका में तो वह मौत के बाद भी गूंजेगी और व्यक्ति के न होने के बाद भी उसकी उपस्थिति का एहसास कराती रहेगी। किराएदार व मकान मालिक तो बदलते रहते हैं। कभी किसी के घर में कोई किराएदार है तो कभी कोई। तो कभी मकान मालिक अपना मकान बेच कर किसी और को मकान मालिक बना देता है। ऐसे में मकान मालिक और किराएदार तो बदलते रहते हैं। इन तीनों कड़ी में जो कुछ नहीं बदलता है तो वह सिर्फ और सिर्फ किरदार होता है। और मैं एक ऐसे किरदार की बात कर रहा हूं जो पत्रकारिता जगत में रविश कुमार के नाम से जाना जाता है और उसे बदलने के लिए ना जाने कितने प्रयोग किए गए यहां तक की जिस संस्था में वे नौकरी कर रहे थे उसे भी बेचकर उनको आकर्षित करने की कोशिश की गई लेकिन अपने किरदार में महारत हासिल रखने वाला शख्स अपनी शख्सियत में कोई परिवर्तन नहीं किया, किरायेदार, मकान मालिक व किरदार में एनडीटीवी को बाय-बाय करके अपनी किरदार को बचाने की कोशिश की है। वैसे तो पत्रकारिता में कौन अच्छा है कौन बुरा है। पत्रकारिता छोटे शहर की हो या देश के बड़े शहर में यह तो जनता तय करती है। ऐसे में रवीश कुमार ने अपने किरदार को बचाने के लिए जो रास्ता चुना है वह प्रशंसनीय वह वंदनीय है। बहुत से लोगों को मेरी बातें बुरी लग सकती हैं क्योंकि रवीश कुमार को जहां देश का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा पसंद करता है वही बहुतेरे उनकी पत्रकारिता पर विरोध भी करते हैं। खैर सबका अपना-अपना अंदाज है और तरीका।
लेकिन रवीश कुमार ने अपने पत्रकारिता की साख को बचाने के लिए जो रास्ता अपनाया अपने किरदार को सहेजने के लिए जो मार्ग चुना वह बधाई के पात्र हैं। देश की सियासत में राजनीतिक चौधराहट में हर किसी को रवीश कुमार के इस तरीके से सीखना चाहिए सत्तापक्ष को उनके तीखे सवाल से अपने अंदर के कमियों को ढूंढ कर दूर करना चाहिए। विपक्ष को उनसे सिखकर सत्ता पक्ष को आइना दिखाना चाहिए और खुद कैसे आगे बढ़े यह तय करना चाहिए। पत्रकारिता का यह किरदार सिर्फ अपना किरदार निभाता आ रहा है। उसमें किसी को लाभ भी पहुंचता है तो किसी को हानि भी होती है। पत्रकारिता से सबको ना तो लाभ पहुंचाया जा सकता है ना सब की हानि की जा सकती है पत्रकारिता का वजूद ही किरदार पर टिका होता है और पत्रकारिता में किरदार का नाम रवीश कुमार के रूप में लिया और लिखा जा सकता है।
वैसे तो एनडीटीवी के बदलने व बिकने को लेकर सारी कवायद को कभी भी यह कहा जा सकता है कि इसमें रवीश कुमार को काम करने या ना करने का कोई लेना देना नहीं है। उनके एनडीटीवी के बिकने के बाद काम छोड़ने को महज एक संयोग कहा जा सकता है। लेकिन यह सिर्फ एक अटकल बाजी हो सकती है, सच्चाई इसे बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि रवीश कुमार का पत्रकारिता का अंदाज और तरीका ही बहुतों के लिए उनके हित और लाभ में कांटा साबित हो रहा था। ऐसे में रवीश कुमार को कैसे बदला जाए यह प्रयोग होना माना जा सकता है। लेकिन मकान मालिक, किराएदार व किरदार में रवीश कुमार पत्रकारिता में अपने हिस्से के बटोरे गए किरदार को लेकर एनडीटीवी से अलग हो गए और साबित कर दिया कि किरदार सिर्फ वही निभा सकते हैं जिनके अंदर उसका जुनून हो।
रविश कुमार अपने सोशल मीडिया पेज पर लिखते हैं…
मैंने इस्तीफ़ा दे दिया है। यह इस्तीफ़ा आपके सम्मान में है। आप दर्शकों का इक़बाल हमेशा बुलंद रहे। आपने मुझे बनाया। आप ने मुझे सहारा दिया। करोड़ों दर्शकों का स्वाभिमान किसी की नौकरी और मजबूरी से काफ़ी बड़ा होता है। मैं आपके प्यार के आगे नतमस्तक हूँ ।

