रचनाकार

मातृ दिवस पर विशेष : “हे माँ”

डा. प्रमोद कुमार अनंग…


धरती का अनुपम उपहार।
मेरी “माँ ” का अद्भुत प्यार।।
बिन मांगे देती रहती है।
क्षमा ,दया ,आशीष ,दुलार।।
जिसको केवल देने आता।
न्योछावर जीवन संसार।।
सुन लेती कि चोट लगी है।
वह रो देती जार-बेजार।।
पलभर भी ओझल ना करती।
मैं जब भी होता बीमार।।
गोद लिटा कर सर सहलाती।
उतरा है हर बार बुखार।।
हर गलती पर समझाती है।
कोई कहे नहीं स्वीकार।।
जब भी दुःख ने हमको घेरा।
नहीं रुका अंसुवन की धार।।
सोपानों पर मेरा चढ़ना।
उसको होती खुशी अपार।।
कौशल्या है वही यशोदा।
सबसे बड़ी वही सरकार।।
तुमसे ज्यादा नहीं किसी का।
मेरे ऊपर है अधिकार।।
ढाल बनी वह फिरती रहती।
बिना म्यान के वह तलवार।।
उससे बड़ा नहीं है कोई।
सारी सृष्टि का आधार।।
हे माँ! छाया बनकर रहना।
नमन तुम्हें है बारम्बार।।…”अनंग”

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