अब संभलने का वक्त है शायद, उठ के चलने का वक़्त है शायद
@ दिनेश दर्पण 1-अब संभलने का वक्त है शायद।उठ के चलने का वक़्त है शायद।2-बात वो कल की हो गई
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@ दिनेश दर्पण 1-अब संभलने का वक्त है शायद।उठ के चलने का वक़्त है शायद।2-बात वो कल की हो गई
Read More(शब्द मसीहा केदारनाथ) जैसे ही तीसरी मंजिल की किसी ने घंटी बजाई, तो गुप्ता जी ने तुरंत अपने छज्जे पर
Read More(शब्द मसीहा केदारनाथ) जम के शुरू हुआ व्यापारचढ़े चूड़ी, चुनरी ओ हारमुंडने लगे सभी नर नारचढ़ने लगीं थाली पे थालीभरने
Read More( आशु कवि के. पी. चौहान आरजू ) कहां ढूंढे हम अपनों कोजो तोड़ गए सब सपनों कोऔर आप गुम
Read More( अखिलानंद यादव ) मृत्यु का भय भयंकर है,जीवन की राह में कंकर है,निज क्रोध बना दिनकर है,आत्मा तो अक्षय
Read More( मनीष गंगा ) जैसे महाभारत या रामायण का युद्ध लड़ा जा रहा हो और तुम पांडव या राम की
Read More( डाॅ सरला सिंह “स्निग्धा” ) जो मंहगी दवाइयाँ खरीदते खरीदते बर्बाद हो गये,किसी के जेवर बिके तो किसी के
Read Moreमेरी कलम से…आनन्द कुमार ऐ सरकार !,लाश को, लाश ही रहने दो न,लाश को, गठ्ठर मत बनने दो।कुछ ऐसे फण्ड
Read More( सूबेदार पाण्डेय कवि आत्मानंद ) मैं घर से परदेश चला था, रोजी-रोटी कीतलाश में। रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर
Read More( डॉ अलका अरोडा ) माना वक्त ले रहा परिक्षाहिम्मत बची नहीं अब बाकिजीवन के आयाम बदल गएहर ओर मचा
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