“भाजपा” के “विजय” का मऊ में “जय-जय”, क्या 2027 की बिसात पर चली गई नई चाल?
@ आनन्द कुमार…
मऊ। राजनीति में संदेश हमेशा भाषणों से नहीं, बल्कि घटनाओं से भी दिए जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी द्वारा मऊ के युवा नेता एवं पूर्व विधायक विजय राजभर को प्रदेश संगठन का मंत्री बनाए जाने के बाद मंगलवार को मऊ में जिस भव्य अंदाज में उनका स्वागत हुआ, उसे केवल संगठनात्मक उत्साह मानना जल्दबाजी होगी। पूर्वांचल की राजनीति को करीब से समझने वाले इसे भाजपा की दूरगामी सामाजिक और चुनावी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में राजभर समाज लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाता आया है। पूर्वांचल की दर्जनों विधानसभा सीटों पर इस समाज का वोट चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि बसपा, सपा और भाजपा—तीनों दल समय-समय पर इस समाज को अपने साथ जोड़ने के लिए नए प्रयोग करते रहे हैं।
कांशीराम और मायावती के दौर में राजभर समाज बसपा का मजबूत आधार रहा। बाद में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने अपने समाज को अलग राजनीतिक पहचान दिलाने का अभियान शुरू किया। जैसे-जैसे ओमप्रकाश राजभर अपने समाज को अपनी तरफ करने में मजबूत होते गए वैसे-वैसे बसपा कमजोर होती गई। आज भी राजभर समाज की राजनीति में ओपी राजभर की पकड़ सबसे मजबूत मानी जाती है। यही कारण है कि उनके राजनीतिक फैसले केवल उनकी पार्टी ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की सियासत का समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं।
भाजपा और ओमप्रकाश राजभर के रिश्ते भी उतार-चढ़ाव से भरे रहे हैं। 2017 में योगी सरकार का हिस्सा बनने के बाद उनका गठबंधन से अलग होना प्रदेश की बड़ी राजनीतिक घटनाओं में शामिल रहा। वर्तमान में दोनों दल फिर साथ हैं, लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है। ऐसे में भाजपा किसी एक चेहरे पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय समानांतर नेतृत्व तैयार करने की रणनीति पर भी लगातार काम करती दिख रही है।
इसी क्रम में भाजपा ने पहले अनिल राजभर को सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी, सकलदीप राजभर को राज्यसभा भेजा, रामसूरत राजभर को विधान परिषद, विजय राजभर को विधायकी तक पहुंचाया और अब विजय राजभर को प्रदेश संगठन में मंत्री बनाकर साफ संकेत दिया है कि पार्टी राजभर समाज में अपना स्वतंत्र संगठनात्मक आधार और मजबूत करना चाहती है।
विजय राजभर का राजनीतिक सफर भी उल्लेखनीय रहा है। सभासद से विधायक तक का सफर तय करने वाले इस युवा नेता को प्रदेश संगठन में स्थान देकर भाजपा ने पूर्वांचल में एक नया चेहरा आगे बढ़ाया है। लखनऊ से मऊ तक उनके स्वागत में उमड़ी भीड़ और कार्यकर्ताओं का उत्साह यह बताने के लिए काफी था कि पार्टी इस नियुक्ति को केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक निवेश के रूप में देख रही है।
हालांकि भाजपा फिलहाल गठबंधन धर्म निभाते हुए सुभासपा के साथ मजबूती से खड़ी है, लेकिन भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए वह राजभर समाज में अपने संगठन की अलग पहचान भी गढ़ना चाहती है। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसकी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
ऐसे में मऊ में “भाजपा” के “विजय” का “जय-जय” केवल एक स्वागत कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूर्वांचल की राजनीति में भाजपा के अगले कदम का संकेत भी माना जा सकता है। आने वाले दिनों में यह रणनीति कितना असर दिखाती है, इस पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ पूरे पूर्वांचल की नजर रहेगी।

