रचनाकार

सच में, हर एक ज़िन्दा और मुर्दे के, चौकीदार हो तुम!

मेरी कलम से…
आनन्द कुमार

ऐ सरकार !,
लाश को, लाश ही रहने दो न,
लाश को, गठ्ठर मत बनने दो।
कुछ ऐसे फण्ड की व्यवस्था कर दो,
ऐसी तस्वीर देखने को न मिले,
आखिर तुम्हारा नुकसान ही क्या है?
मर गया, मरने वाला,
छोड़ो, दोष चाहे जिसका भी हो,
कोई सिस्टम पर उंगली नहीं उठाएगा,

बस ऐ सरकार,
लाश को, लाश ही रहने दो न,
लाश को, गठ्ठर मत बनने दो।
सोचो, आखिर वह गरीब,
जो लाश बन गया,
मरते ही उसके नाम से,
गरीबी शब्द हट गया,
क्या नुकसान हुआ तुम्हारा?
दिल और दिमाग से सोचो,
तो ऐ सरकार,
तुम्हारा सिर्फ़ फ़ायदा ही फ़ायदा है।
अब तुम्हें उस गरीब को,
सस्ता अनाज नहीं देना पड़ेगा,
मुफ्त की दवा भी नहीं मांगेगा वह,
न मजदूरीभत्ता मांगेगा,
उसे आवास और पेंशन,
भी नहीं देना पड़ेगा तुम्हें,
वह कोई सब्सिडी भी नहीं लेगा,
सोचो! आखिर सोचो तुम,
करोड़ों में कुछ ही तो होते हैं ऐसे,
जो हालात और बदहाल ज़िन्दगी की वजह से,
नहीं ले जाते अपने सगे की लाश को,
बा-इज्ज़त लाशवाहन से,
इनका सफर भी सैकड़ों किलोमीटर का नहीं होता,
बस चंद किलोमीटर या मील का होता है,
आखिर क्या लग जाता सरकार का?
अगर ऐसी लाशों को पहुँचा देती तो,
सोचो! जरा सोचो मन से,
कुछ भी नहीं,
मात्र कुछ हजार रूपये,
जाने वाला तुम्हारा ही बचा कर जा रहा है,
क्या वह हकदार नहीं है?
क्या उसका अधिकार नहीं है?
कि उसकी विवशता, बदनसीबी, गरीबी,
को तुम शर्मिंदा होने से बचा लो,
बोलो! सरकार बोलो।
क्या तुम उसके कृत्य से लज्जित नहीं होते हो,
बोलो…….. सरकार बोलो,
क्या तुम्हारा दायित्व नहीं है?
कि तुम मृतात्मा के प्रति अपने कर्तव्य निभा लो,
आखिर शपथ लेते वक्त क्यों भूल जाते हो,
ज़िन्दा या मुर्दा, हर व्यक्ति के,
सुख-दुख के जिम्मेदार हो तुम,
देश के हे हर नेता,
सच में हर इक जिन्दा और मुर्दा के,
चौकीदार हो तुम।
सच में हर एक ज़िन्दा और मुर्दा के,
चौकीदार हो तुम!!

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