रचनाकार

रचनाकार

जाति-धर्म जब खेल लिए तो, टिकट-टिकट अब खेल रहे हैं

मेरी कलम से…आनन्द कुमार गजब तुम्हारी लीला है,गजब तुम्हारी शान,हे राजनीति के राजहंस,तेरी अजब-गजब पहचान,लोकल नेता तो बदनाम झूठे हैं,असल

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