रचनाकार

जाति-धर्म जब खेल लिए तो, टिकट-टिकट अब खेल रहे हैं

मेरी कलम से…
आनन्द कुमार

गजब तुम्हारी लीला है,
गजब तुम्हारी शान,
हे राजनीति के राजहंस,
तेरी अजब-गजब पहचान,
लोकल नेता तो बदनाम झूठे हैं,
असल कारस्तानी तो सरदारों की है,
जाति-धर्म जब खेल लिए तो,
टिकट-टिकट अब खेल रहे हैं,
जिसको दौड़ाया था जनता के बीच,
उसको घर को ठेल रहे हैं,
इज्जत का तो वाट, लगा कर,
फजीहत बेवजह फ्री कर रहे हैं,
खुले आंख में सपने देकर,
मुठ्ठी भर कर लूट रहे हैं।
सदन भेजना तो दूर की बात,
जतन करना ना समझ रहे हैं,
लाठी-लाठी हांक रहे हैं,
बिन प्लानिंग के हाफ रहे हैं,
गिरगिट भी हो जाए पीछे,
ऐसे कस कर चाप रहे हैं।

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