रचनाकार

पुस्तक समीक्षा : मंटो ना मरब

समीक्षक : डा. राजकुमारी

पुस्तक – मंटो न मरब
लेखक – केदरनाथ शब्द मसीहा
प्रकाशन -मचान दिल्ली
समीक्षक डॉ. राजकुमारी
पेज़ संख्या -114
मूल्य -150

डा. राजकुमारी

लेखक केदारनाथ द्वारा रचित लघुकथा संग्रह ‘ मंटो न मरब ‘ पिछले दिनों उनके द्वारा भेंट किया गया। इन दिनों वही अध्ययन का केंद्रीय विषय था, लघुकथाकार ने अपनी कथाओं के माध्यम से जीवन के विभिन्न विषयों को व्यंग्यात्मक,गुदगुदाती हँसी और कहीं- कहीं पर आलोचनात्मकता दृष्टि से भी परखने की कोशिश की है। उनकी इन लघु कथाओं में विषयों की नवीनता, बहुयामी दृष्टिकोण को भी देखा जा सकता है। आधुनिक युग की चुनौतियों, समस्याओं के प्रति लेखक सजग है तथा अपनी पैनी नज़र लगातार उन पर रखता है, यही कारण है कि सामाजिक, सांप्रदायिक, पारिवारिक विषय को महत्व देते हैं। स्त्री भ्रूण हत्या जैसे अपराध के पीछे पिता मन के भय की एक नई परत वे खोलते हैं और पुरुष की कठोरता के बाह्य रूप और नर्म चिंतित व्यक्तित्व को प्रकाश में लाते हैं। विकसित समाज के खोखलेपन की सीवन को व्यंग के मध्य से उधेड़ दिया गया है। लघुकथाकार तथ्यहीनता, साझों की बात मजबूती से रखते हैं। यथास्थिति ये है कि नैतिक मूल्य गिरते जा रहे हैं, धर्म और देवताओं को भी जातिवाद के कटघरे में बिंद कर खड़ा कर दिया गया है।राम का विसर्जन होने का मूल कारण निम्न जाति की शबरी के बेर खाना है , राम के विसर्जन की चिन्ता मुस्लिम को है किंतु पंडित को छुआछूत सता रहा है, वहीं शिक्षा की आड़ में किस प्रकार के घिनौने खेल खेले जा रहे हैं उनका खुलासा भी कथाकार करते हैं। सफ़ाईकर्मियों की जिंदगी का यथार्थ रूप प्रस्तुत करते हुए गहरी संवेदना से लेखक भरे हुए हैं। एक मनुष्य का दूसरे मानव के हाथों का खिलौना बनता गया ये जीवन की कितनी बड़ी विडम्बना है। पुलिस प्रशासन का घटिया रवैया किस प्रकार एक इंसान के प्रति संदेहपरक है और वह मुसीबत गले पड़ने के भय से किसी भी दुर्घटना से जख्मी होने पर भी किसी इंसान की मदद से कतराता है इसका अंदाजा ‘ चोट’ लघुकथा से सहज ही हो जाता है। पुलिस वाले की अकड़ ढीली करती है एक कोठे वाली, वह जानती है अपना पैसा वसूल करना, जो आम जन से पैसा निकलवा लेते वह उसकीअंटी ढ़ीली कराती है, वैश्या जिनके यहां वे मुंह काला करने आते हैं, झूठ की बिनाह पर किस प्रकार लूट खसोट चल रही कथा इसी को सपष्ट करती है। मिडिया का झूठ, सत्ता के झूठे वादे, बेरोजगारी में कबाड़ी बनना, सभी समकालीन मुद्दों को डंके की चोट पर, निर्भीकता से उठाने के जोखिम उठाए हैं शायद इसका पुस्तक का शीर्षक इसलिए ये रखा गया है। मुस्लिमों के प्रति एक भिन्न दृष्टिकोण अपनाने वाले खुद को शिक्षित समझने वालों के मुंह पर तमाचा जड़ती लघु कथा ‘वो क्या अनपढ़ हैं’।

समकालीन लघुकथाकार ने हास्य , व्यंग्य की भावभूमि पर उतरकर आमजन को सरस लघुकथा संग्रह प्रदान किया है। लघु कथाओं के शीर्षक भी रोचकता लिए हैं जैसे ‘ बड़े लेखक कैसे बने’, ‘ कीर्तन ही करेंगे’, ‘ आज के संत’, ‘ इसको ख़बर कहते हैं’ आदि। कुछ लघु कथाएं एक पेज़ की हैं तो कुछ छह सात पंक्तियों की भी हैं।

उनकी विवेकशीलता का परिचय उनकी कथाएं दे रही हैं, जो संक्षिप्त हैं किन्तु पूर्ण हैं, जन पक्षधरता लिए हैं। नई दुनियां के विषय और शब्द शक्ति, लोकोक्ति मुहावरे चुटीली भाषा है। मैंने प्रथम लघुकथा संग्रह पढ़ा है, बहुत रोचक था मज़ा आ गया। आप इस लघु कथा को अवश्य पढ़ें।

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