रचनाकार

सांसों पे भारी कालाबाजारी

( डॉ मीना कुमारी परिहार )


“धर्म और ईमान को बेचकर
करते हैं जो कालाबाजारी
वो न बक्शे जाएंगे खुदा के…”
आज हमारा देश महामारी के चपेट में है। कोविड 19 का दूसरा स्टेज बहुत ही खतरनाक रूप धारण कर चुका है। इस संकट काल में जीवन रक्षक वस्तुओं का संग्रह करने की होड़ एक सामान्य प्रतिक्रिया है। पिछले वर्ष भी हमने यही महसूस किया था। हालांकि तब कोरोना के भय के बीच लांकडाउन इस कारण लगा था ताकि हमारा जीवन सुचारु रूप से चलता रहे। डर और भय के कारण कुछ समझ नहीं आए तो ऐसी प्रवृत्ति सक्रिय हो जाती है। यह जीवित रहने की होड़ है, जो इंसान से वह सब क्या रहा है जो उचित नहीं है।
इसका ताजा उदाहरण है आंक्सीजन सिलिंडर, रेमेडेसिविर इंजेक्शन सहित खाद्य सामग्री आदि अन्य दवाईयों के संग्रह करने की प्रवृत्ति।यह इस समय इतनी हावी हो चुकी है कि इनके संग्रह में वे लोग भी कर लेना चाहते हैं जो वर्तमान में स्वस्थ हैं और उन्हें इनकी जरूरत भी नहीं है। इससे देश के अलग-अलग हिस्सों में आंक्सीजन सिलिंडर की कालाबाजारी के साथ-साथ दवाईयों की भी जमाखोरी हो रही है।रेमेडेसिविर इंजेक्शन, डाक्सीसाइकिलिन, आइवरमेक्टिन आदि जरूरी दवाओं का संग्रह, जी जमाखोरों और कालेबाजारियों के द्वारा किया जा रहा है। कालाबाजारी करनेवाले इन्हें खुदरा मूल्य से क‌ई गुना अधिक दरों पर बेच रहे हैं। इसकी असर उन लोगों पर पड़ रहा है जिनके परिजन अस्पतालों में कोशिश से जूझ रहे हैं। कालाबाजारी करनेवाले इन्सानियत के दुश्मन बन बैठे हैं। कालाबाजारी के इस वायरस का घातक असर पड़ रहा है।कोरोना वायरस से जुझते लोगों को कालाबाजारी के इस “वायरस” से भु बचाने की जरूरत है।
किसी ने ठीक ही कहा है-
“किस्मत खड़ी थी दरवाजे पे
और मैं मंजिल के सामने था
कि जीने कि नजरिया बदल गया
किसी की रोजी-रोटी छीन गई
तो किसी के कमाने का जरिया बदल गया”
हे ईश्वर !यह विनाशलीला कहां जाकर रुकेगी..?इस प्रश्न का जवाब मनुष्य के पास नहीं है। तेरा ही रहम है जिससे अभी तक, सबसे बड़ी मानव प्रजाति सहित, तेरी अन्य प्रजातियां अभी तक अस्तित्व में हैं। मरनासन्न मानवता नहीं बची तो तेरी बनाई हुई सृष्टि का क्या होगा।अपनी सृष्टि से बचा ले। हमें अहसास हो गया है कि कुदरत के आगे हम पहले भी जीरो थे,आज भी जीरो हैं।कार है,पैसा है,दुकान है, फैक्ट्री है,सोना चांदी, बहुत सारे कपड़े भी हैं,सब जीरो जैसे हो ग्रे हैं। अपने ही घर में डरते-डरते घूम रहे हैं,पहली बार ऐसा हो रहा है कि कोई अपना मित्र भी आ जाते, तो अच्छा नहीं लग रहा है।कुदरत ने बता दी हमें हमारी औकात,सबका घमंड चूर-चूर कर दिया , बहुत लोग घमंड में कहते थे कि तुम हमें जानते नहीं हो….. अब ये कुदरत ने बता दिया है कि तुम लोग मुझे जानते नहीं हो। यही जिन्दगी है,ये ही सत्य है।
इस कोरोना काल में इंजेक्शन ,नकली दवाई, प्लाज्मा, मेडिकल उपकरण बेचने वालों से एक सवाल है..?जब लोग मेहनत की कमाई खर्च कर अपनों को नहीं बचा रहे हैं तो तुम्हारी पाप की कमाई से तुम्हारे परिवार का,और तुम्हारा क्या हाल होगा…?

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