आयेगी जब भी हमें मिलने क़ज़ा देखेंगे
@ अश्क चिरैयाकोटी
बेवफ़ा ही वो सही उनकी जफ़ा देखेंगे,
आज हम अपनी मुहब्बत का सिला देखेंगे।।
उनकी महफ़िल से चले जाते कभी का उठकर,
क़त्ल करने की मगर उनकी अदा देखेंगे।।
दिल की बस्ती में हैं जो आग लगाने वाले,
वो धुआँ और कहाँ तक है उठा देखेंगे।।
शामे-ग़म भी है यहाँ और है तनहाई भी,
ऐसे में होता है क्या दर्दे-वफ़ा देखेंगे।।
ज़िन्दगी तू जो है नाराज़ तो नाराज़ सही,
आयेगी जब भी हमें मिलने क़ज़ा देखेंगे।।
हम न जब होंगे तो क्या याद न आयेंगे तुम्हें,
तुम्हीं कह दो न कि हम दौर नया देखेंगे।।
“अश्क”हम रुख़ तो हवाओं का बदल दें लेकिन,
हमको ले जायेगी किस ओर हवा देखेंगे।।
( लेखक पेशे से अधिवक्ता हैं और मऊ जनपद के चिरैयाकोट के रहने वाले हैं )

