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‘विश्व टीबी दिवस (24 मार्च)’ जागरूकता से ही संभव है टीबी उन्मूलन


मऊ। हर वर्ष 24 मार्च को ‘विश्व टीबी दिवस’ मनाया जाता है जिसका प्रमुख उद्देश्य टीबी की रोकथाम और उपचार तक पहुंच बनाना, निरंतर फॉलो-अप, जांच के लिए पर्याप्त संशाधन, निक्षय पोषण योजना के तहत आर्थिक मदद, सामाजिक तिरस्कार और भेदभाव को खत्म करने को बढ़ावा देना और लोगों को एक न्यायसंगत, अधिकार-आधारित और प्रतिक्रिया को बढ़ावा देना है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ सतीशचन्द्र सिंह ने बताया कि क्षय रोग (टीबी) का पूरा नाम ‘ट्यूबरकुल बेसिलाइ’। टीबी एक संक्रामक रोग है और इसे प्रारंभिक अवस्था में ही न रोका गया तो जानलेवा हो जाता है। यह व्यक्ति को धीरे-धीरे मारता है। टीबी रोग को अन्य कई नाम से जाना जाता है, जैसे तपेदिक, क्षय रोग तथा अस्थमा। टीबी रोग एक माइक्रोबैक्टीरियम के संक्रमण के कारण होता है। इसे फेफड़ों का रोग माना जाता है, लेकिन यह फेफड़ों से रक्त प्रवाह के साथ शरीर के अन्य भागों में भी फैल सकता है, जैसे हड्डियाँ, हड्डियों के जोड़, लिम्फ ग्रंथियाँ, आँत, मूत्र व प्रजनन तंत्र के अंग, त्वचा और मस्तिष्क के ऊपर की झिल्ली आदि बाल को छोड़ शरीर में कही भी टीबी हो सकता है। वर्तमान में जिले में 963 टीबी रोगी हैं। इस वर्ष अभी तक 52 टीबी से ग्रसित बच्चों को गोद लिया जा चुका है ।
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ एसपी अग्रवाल ने बताया कि टीबी के बैक्टीरिया साँस द्वारा शरीर में प्रवेश करते हैं। किसी रोगी के खाँसने, बात करने, छींकने या थूकने के समय बलगम व थूक की बहुत ही छोटी-छोटी बूँदें हवा में फैल जाती हैं, जिनमें उपस्थित बैक्टीरिया कई घंटों तक हवा में रह सकते हैं और स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में साँस लेते समय प्रवेश करके रोग पैदा करते हैं। रोग से प्रभावित अंगों में छोटी-छोटी गाँठ अर्थात्‌ टयुबरकल्स बन जाते हैं। उपचार न होने पर धीरे-धीरे प्रभावित अंग अपना कार्य करना बंद कर देते हैं और यही मृत्यु का कारण हो सकता है।
उन्होंने बताया कि टीबी रोग के वैसे तो कई कारण हैं, निर्धनता, गरीबी के कारण अपर्याप्त व पौष्टिकता से कम भोजन, कम जगह में बहुत लोगों का रहना, स्वच्छता का अभाव है। जिस व्यक्ति को टीबी है, उसके संपर्क में रहने से, उसकी वस्तुओं का सेवन करने, प्रयोग करने से। टीबी के मरीज द्वारा यहाँ-वहाँ थूक देने से इसके विषाणु उड़कर स्वस्थ व्यक्ति पर आक्रमण कर देते हैं। मदिरापान तथा धूम्रपान करने से भी इस रोग की चपेट में आ सकता है। साथ ही फेक्टरीयों में काम करने वाले मजदूरों को भी इसका खतरा रहता है।

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