सरकार को अर्ज़ी ! “सरकार! सरकार!
■ ओमा The अक्©
मैं लाचार/बीमार
आपकी प्रजा
लोकतंत्र की सजा!
दिलाना चाहता हूं
आपको ध्यान
मैंने किया था मतदान
“आपको”–
अरे बाबा “आप” मतलब
सरकार को!
क्या करूँ-
देनी पड़ रही है सफाई
क्यों कि आपका निज़ाम है
“दवाई के साथ कड़ाई”!
सरकार! सरकार!
मैं बेकार/ बे-रोज़गार!
लगता हूँ गुहार-
हम पर हो रहा
अत्याचार!
लगातार लगातार!
पहले से थी मंदी
उस पर नोटबन्दी
फिर जी•एस•टी का खेला
झमेले पर झमेला!
चल ही थी ये तलवार दू-धारी
कि आ गई-
‘इश्तिहारी-महामारी’
नाम था “करोना”
मतलब “मरोना”
टीवी पर शोर
घर में सब बोर
सारे कमज़ोर
उस पर से चोर
चोरी तैयार
जाता बीमार
लुटता घरबार.!
सरकार! सरकार!
मैं आपका मतदाता!
बार बार भूल जाता
की हमने खाई है क़सम
“देने” की
और आपने ली है शपथ
“लेने” की
सो आप लिए जा रहे हैं
हम दिए जा रहे हैं
बिना इनकम के
इनकम टैक्स
बिना सेल के
सेलटैक्स
बिना रौशनी के
बिजली का बिल
स्कूल-कॉलेज की
भयंकर फ़ीस
बिना किये पढ़ाई
व्यापार लगा दक्खिन
भर रहे चुपचाप
बैंकों की ई•एम•आई..!
इधर ये-
“यमराज के फ़रिश्ते”
बुला कर डिस्पेंसरी
और हस्पताल
लूट ले रहे सारा माल
कर के कंगाल
पकड़ा दे रहे हैं लाशें
ये “भगवान् फ़र्ज़ी”
कहतें हैं–
“ईश्वर की मर्ज़ी”!
अरे!अगर ये है
ईश्वर की मर्ज़ी
तो बन्द क्यों है
मंदिर और मस्जिद
चर्च और गुरुद्वार
तब तो सरकार!
बन्द करो हस्पताल
ये मक्कारी का जाल
हम क्यों दे अपनी कमाई
उन धूर्तो को
जिन्हें नहीं पता यह भी
की उनकी यह “इम्पोर्टेड-दवाई”
ख़त्म करेगी बीमारी
या ख़त्म होगा बीमार!
ऐसे ‘नाचार’ को
कहना “चारागर”
हुआ बद से बदतर!
सरकार! सरकार!
हर पाँच बरस बाद
हम होते हैं तैयार
किसी से “थप्पड़” खाने को
किसी से बनने को “फ़ूल”
कहीं “सपोलों” के शिकार
तो कहीं “हाथियों के पाँव” तले धूल
कोई करके आप-आप
देता है गर्दन नाप
कम्यून बनाए दुष्ट
निठल्ले ह्रष्टपुष्ट
खेलते है महुअर!
बनके मदारी
नचाते हैं बानर!
और हम सब जनतंत्र के मूक दर्शक
पीटते है ताली
कभी कभी थाली
फेंकते हैं पैसे
उस मरे हुए बंदर पर
जो मदारी की डुगडुगी पर
नाचता है
जो मदारी की डुगडुगी पर
जी लाश बन जाता है!
खेल देखते देखते हम गए हैं भूल
कि ये बंदर का नाच नहीं
हमारा वर्तमान है
कि ये बंदर की लाश नहीं
हमारा भविष्य है!
सरकार! सरकार!
मैं आपकी रियाया
मुझे जो नज़र आया
मैंने आपको बताया
लगा दी है लोकतंत्र की अर्जी
बाकी आप
हैं माई बाप
बाकी आपकी मर्ज़ी…!!”
29 मई 2021

