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दो दशक की पत्रकारिता की प्राचीरों को भग्नावशेषों में तब्दील करके तुम खुश तो बहुत होगें..न.?


@ अरविंद सिंह #आजमगढ़
खुश तो होगे बहुत.. कि तुमने अपनी सनक एक फ़कीर कलमकार की गृहस्थी को ध्वस्त कर पूरी कर ली.खुश हो होगें बहुत कि..साला बड़ा.. पत्रकार बनता..फिरता था. वो क्या कहते हैं ..फ्रीलांस जर्नलिस्ट..एक ही झटके में उसके समूचे अस्तित्व को जमीदोज़ कर दिया. उसके बच्चों को सड़क पर ला दिया.. कितना खुश हो रहे होगे न..जब अपनी पिता की बीस बरस की कमाई और चालीस बरस की पत्रकारिता की साख और विश्वास को तुम्हारे बुलडोजर के नीचे जमीदोज़ होते बेटियां देखी होगीं. . बच्चियाँ गिड़गिडाई होगी. चिल्लाई होगीं. क्योंकि ऐसा करने से तुम्हारे अहम की तुष्टि होती है.. न..

सच तो यह है तुम आज निरंकुश पावर में हो..और तुम्हारी यह पावर तुम्हारे निरंकुश सनक पर सवार होकर चलती है. तुम्हारे अंदर एक हीनग्रंथि है कि-तुम हारना नहीं सिखे हो, और जीतने के लिए कितना भी नीचे जा सकते हो..किसी भी कीमत को चुका सकते हो, क्योंकि तुम एक पत्रकार से नहीं अपने आप से लड़ रहे हो, अपनी उत्तेजना और हार के डर से लड़ रहे हो. जब तुम रोजाना अपने दफ़्तर से आवास, आते-जाते देखते थे कि एक पत्रकार का दफ्तर कैसे चल रहा है.. क्योंकि उसके चलते रहने से तुम्हें ऐतराज था. इस कार्यालय के होने से ऐतराज था. क्योंकि तुम्हारी सनक पर सवार तुम्हारी शक्ति तुमसे रोज सवाल करतीं थीं कि-तुम इसे कब गिराओगे.?.. क्योंकि तुम्हे उत्तेजना चाहिए, सनसनी और भय चाहिए ..जिसका केन्द्र तुम रहो.. इसी लिए तुमने रात के अंधेरे को चुना, दिन के उजाले को नहीं. इसी लिए तुमने सुनवाई के अवसर देने से पहले ही इसे जमीदोज़ कर देना चाहते थे, और अपने अहम की तुष्टि कर ली. तुम्हे खुशफहमी में रहने का पूरा अधिकार है. क्योंकि तुमने केवल किताबी ज्ञान अर्जित की है वह भी थोड़ा-थोड़ा.. आईएएस होना..ज्ञानी होना नहीं होता है.. एक इंसान बन पाना तो सर्वोत्तम कसौटी है.. लेकिन भूलना मत यह नैयर -ए-आजम की सरजमीं है. जिसने भूख का भूगोल और बग़ावत का इतिहास न केवल पढ़ा है..बल्कि जीया है.. हर जुर्म और ज्यादती के विरूद्ध आवाज उठती रही है..यूँ ही नहीं कहाँ गया है कि 'जो जर्रा यहाँ से उठता है, वो नैयर -ए-आजम होता है.. .! 

और हाँ जो आदमी पत्रकारिता के भग्नावशेषों पर आज खड़ा होकर अनंत की तरफ देख रहा है- वह आदमी नहीं, एक मुकम्मल बयान है/ माथे पर उसके चोट का गहरा निशान है.. जिसे सब नहीं देख सकते हैं.. आप जैसे तो बिलकुल भी नहीं..क्यों कि आप अभी पावर के सनक पर सवार हो.. तुम्हें घृणा नहीं प्रेम की जरूरत है.. और दोनों का उदगम एक ही होता..

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