प्रधानमंत्री का पता दो, मुझे अपना हेडफोन बनवाना है…
व्यंग-राहुल पाण्डेय
छोटी वाली बहन पिन्नी ने जिद पकड़ ली है उसको प्रधानमंत्री से मिलना है! क्यों मिलना है? क्योंकि हर हफ्ते खराब होने वाले हेडफोन को ठीक करने के लिए दुनिया में कोई भी तैयार है और उसे इसकी शिकायत प्रधानमंत्री से करनी है! लग रहा है कि इस बार मामला महज शिकायत से नहीं सुलटने वाला! प्रधानमंत्री से मिलने पर उसे अपना हेडफोन उन्हीं से बनवाना भी है! बोलती है कि “वह बना देंगे, जैसे सब कुछ बना रहे हैं वैसे ही हेडफोन भी बना देंगे!” यह पूछने पर कि “तुम तुम्हें कैसे पता कि वह हेडफोन बना ही देंगे?” वह कहती है” बकवास ना करो प्रधानमंत्री का पता बताओ!” यह पूछने पर कि “उसके पास ऐसे कितने हेडफोन हैं जो खराब पड़े हैं?” पिन्नी बताती है कि “हर महीने दो-तीन हेडफोन खरीदती है, कुछ दिन चलते हैं फिर जल्द ही चलते-चलते बैठ जाते हैं!” खराब हेडफोन उससे उसकी पूरी ड्रार भर गई है! सारे के सारे आपस में उलझे पड़े हैं!
मैंने पूछा कि “क्या तुमने उन्हें कंघी की है?” पूछती है कि “हेडफोन को कंघी क्यों करूं?” मैं बोला “हेडफोन के उलझे तारों को कंघी नहीं करोगी, उनकी चोटी नहीं बनाओगी तो प्रधानमंत्री के पास इन्हें कैसे लेकर जाओगी? उलझे तारों को देखकर क्या उन्हें बुरा नहीं लगेगा? और उनके पास क्या यही काम बचा है कि बैठकर तुम्हारे हेडफोन के उलटे तारों को सुलझाएं या सुलझा कर उनका जुड़ा बांधे?” इस पर पिन्नी दांत पीसकर कहती है कि “बोला ना बकवास ना करो! प्रधानमंत्री का पता बताओ!” पिन्नी ने बताया कि “हेडफोन पहले भी उलझे रहते थे कुछ दिन चल जाते थे, अब उलझे ही रहते हैं, चलने का नाम नहीं लेते! कई तो ऐसे निकले कि आज खरीदा कल खराब! ऐसा एक भी हेडफोन नहीं जिसके दोनों स्पीकर्स से आवाज आती हो!” कहती है कि “खराब हेडफोन बनवाने जाओ तो दुकानदार इतना खराब-खराब मुंह बनाते हैं कि मन खराब हो जाता है!” पूछो कि “ठीक कर लोगे?” तो उल्टा पूछते हैं कि “हेडफोन भी कहीं सही होता है?” दो-चार बार बनवाने जा चुके हैं लेकिन अब उसको सीधे प्रधानमंत्री के पास ही जाना है और उन्हीं से ठीक कराना है! मैंने पूछा कि “प्रधानमंत्री तुम्हारे लिए पेंचकस और प्लास जेब में लेकर घूम रहे हैं क्या?”
कहती है कि “इतना जोड़-तोड़ बगैर पेंचकस और प्लास के तो करते नहीं होंगे? और अगर उन्हें हेडफोन बनाना नहीं आता तो प्रधानमंत्री ही क्यों बन बैठे हैं? इतनी बार विदेश, गए एक हेडफोन बनाना भी नहीं सीखा होगा?” मैंने कहा “जा नहीं बताता तुझे प्रधानमंत्री का पता!” तो कहती है “घर आओ तुम्हें कसकर कूटेंगे तो सब बता दोगे!”
(लेखक-राहुल पाण्डेय पत्रकार एवं ब्लॉगर हैं द्वारा चेष्टा देवी बिहार)

अच्छा मंच है!