आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी बताने वालों एक विश्वविद्यालय देकर तो देखो
(अरविंद सिंह)
आजमगढ़। हमने बहुत पहले एक छोटी सी कहानी सुनी थी। कितनी हकीकत है और कितना फसाना इस पर मत जाइएगा।लेकिन कहानी का लक्ष्य जरूर पकडिएगा।
दक्षिण अफ्रीका में एक छोटा सा द्वीप है। कबिलाई और आदिवासी प्रकृति के लोग रहते हैं। उनके यहाँ एक मिथक है कि-‘जब ये कबिलाई लोग नृत्य करते हैं तो पानी बरसता है।’ यह मिथक आज तकनीकि और विज्ञान के दौर में भी जारी है। दुनिया भर की एजेंसियां,रिसर्चर और वैज्ञानिक इस सत्य से सामना किये लेकिन इनके नाचने से पानी बरसने के अबूझ पहेली को हल नहीं कर सके। हार मान कर सभी वैज्ञानिक और रिसर्चर इस कबिले के सरदार से मिले और पूछे कि-“आखिर ऐसा क्या है कि आप के समुदाय के लोग जब नृत्य करते हैं तो पानी बरसने लगता है?” पहले तो सरदार दुनिया के इन महान वैज्ञानिकों और रिसर्चरों की सोच और उपलब्धि पर हँसा.. अटट्हास किया और फिर जवाब दिया,
“देखों दुनिया वालों! यह कोई मिथक नहीं है बल्कि हमारा अगाध और अटूट विश्वास है। हम तब तक नाचते हैं…हम तब तक नाचते हैं .. हम तब तक नाचते हैं,जब तक कि पानी न बरस जा। “अर्थात् पानी बरसने तक हम निर्ब़ाध.. बिना थके.. बिना रूके नाचते हैं.. और एक दिन पानी बरस ही जाता है।
दरअसल विश्वविद्यालय के संदर्भ में आजमगढ़ इस कहानी को अब जीने लगा है और उसे अब एहसास हो चुका है कि हमें भी पानी बरसने तक नाचना है। और हमसे कोई भी,चाहे मगरूर सत्ता ही क्यों न हो, यह विश्वास नहीं छिन सकती है। यह विश्वास ही हमारी ताक़त है और विश्वास ही हमार संघर्षपथ। अब यह पथ, चाहे अग्निपथ बने या लोकपथ, हमें एक अदद विश्वविद्यालय पाने से अब कोई रोक नहीं सकता है। तमसा के पानी में आज भी वही रवानी है जो आजादी के समय था। हमने एक बार नहीं बल्कि तीन तीन बार अपने को आजाद घोषित किया है। ब्रितानी जेलों के सिखंचे हमारी फौलादी जज्ब़े को रोक नहीं सके और हमने जेल के फाटक को तोड़, अपनों को आजाद कराया है। तमसा के पानी ने बूढ़े कुँवर सिंह में जवानी ला दी थी। हमने भूख का भूगोल जीया है लेकित बगा़वत का इतिहास कभी नहीं छोड़ा है। हम कहने को तो एक जनपदीय लोग हैं लेकिन हमारी विचार और सोच की भूमि केन्द्रीय है। हम जितना उत्तर को सोचते हैं उतना दक्षिण को महसूस करते हैं। पूरब हमारे सोच में है तो पश्चिम हमारी पहुँच में। यह ऋषियों और दरवेशों की भूमि है। क़लम और कौपिन की धरती है। यह सर्जना और रचना की भूमि है। खडी़ बोली का प्रथम महाकाव्य ‘प्रियप्रवास’ इसी धरती पर रचा गया है। यहाँ आज से लगभग ढा़ई सौ साल पहले विरह के गीत गाये गये हैं। यानि पलायन और पीडा़ हमारी नसों में रक्तप्रवाह बनकर सदियों से दौड़ रही है। हमने सामाजिक न्याय की लड़ाई को लड़ा है। हमने अन्याय के विरूद्ध आवाज मुखर की है। हमने देश ही नहीं दुनिया को रौशनी दी है। हमने वोल्गा से गंगा को जोडा़ है। तो वितस्ता की लहरों को भी महसूस किया है। गंगा जमुनी रवायत हमारी पहचान है तो विभिन्न विचारधाराओं को आत्मसात् कर चलने का हुनर हमें पूर्वजों ने सिखाया है।
ऐसी समृद्ध अतीत वाली धरती का वर्तमान इतना नि:सहाय नहीं हो सकता है। हमें लड़ना तो विरासत में सिखाया गया है। कभी गरीबी के खिलाफ तो कभी अन्याय के खिलाफ। यह लड़ाई आज अशिक्षा के खिलाफ है। विश्वविद्यालय तो हमें लेना ही होगा चाहे तमसा के पानी को एक बार फिर गर्म ही क्यों ना होना पड़े। हमें विश्वास है कि तमसा एक बार फिर अपनी रवानी दिखायेगी। क़लम की धरती क़लम के लिए आवाज़ उठायेगी.. जिसे मिलाना है वो हमारी आवाज़ में आवाज़ मिला दे। यह आवाज़ एक दिन रायसीना को भी कपां देगी।
सुहेल साहब के शब्दों में-
“इस खित्ता-ए-आजमगढ़ पे फै़जान-ए-तजल्ली है यक्सर/जो ज़र्रा यहाँ से उठता है वो नैय्यर-ए-आजम होता है।”
(लेखक शार्प रिपोर्टर मैगजीन के सम्पादक हैं)

