दो शव यात्रा : एक जननेता विनोद की तो दूसरी हमारे समय की पत्रकारित्रा और उसकी छिछली सोच की
संदीप अस्थाना
आजमगढ। जीवन व मृत्यु शाश्वत सच है। इस सच को नकारा नहीं जा सकता है। इसके विपरीत यह भी कितना बड़ा सच यह है कि हम इस सच को पूरी तरह से नकारने में जुटे हुए हैं। इसकी वजह यह है कि कहीं न कहीं हम सबसे बड़ी कमीनगी की पत्रकारिता को जी रहे हैं। यह बात हम इतनी ईमानदारी से शायद इसलिए कह पा रहे हैं कि हम शायद योगेश मिश्र जैसे ईमानदार प़त्रकार के सानिध्य में काम कर रहे हैं। यह पत्रकारिता की कमीनगी नही ंतो और क्या कहा जायेगा कि मेरे जीवन की, सच तो यह है कि मेरे दो दशक के पत्रकारिता के जीवन की यह सबसे बड़ी शवयात्रा थी। यह शवयात्रा थी मेरे बड़े भाई विनोद सिंह की। अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र के टहरवाजिदपुर गांव के रहने वाले थे। अपना जीवन बिता दिया, आम आदमी की तकलीफों को दूर करने के लिए प्रतिरोध की राजनीति में। यही प्रतिरोध की राजनीति की ही वजह रही कि वह कभी भी राजनीतिक दलों के लिए स्वीकार्य नहीं रहे। उस इलाके के बड़े से बड़े तथाकथित नेताओं ने केवल उनका उपयोग ही किया। बड़े भाई विनोद सिंह का असामयिक निधन हुआ तो कोई भी तथाकथित वह नेता शोक संवेदना तक व्यक्त करने नहीं पहुंचा जिसने विनोद सिंह जी का उपयोग किया था। फिलहाल यह किसी को तकलीफ भी नहीं है। वजह यह कि सभी इस सच को जानते हैं कि राजनीति में तो किसी हद तक गिरा जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता में इस हद तक गिरा जा सकता है यह अब मैं जान पाया हूं। मुझे यह खुद पता नहीं है कि मैं बड़ा पत्रकार हूं या छोटा पत्रकार। मुझे यह भी पता नहीं है कि मैं बड़े संस्थान में काम कर रहा हूं या छोटे संस्थान में। लेकिन मुझको यह पता है कि यदि मैं सपा सरकार में यश भारती पाने वाले श्री योगेश मिश्र का जूनियर हूं और मुझे सपा के सरकार में भी सपा के खिलाफ लिखने की आजादी दी गयी थी। इसके विपरीत इस सच को मैं नहीं भुला पा रहा हूं कि मेरे दो दशक के पत्रकारिता जीवन की सबसे बड़ी शवयात्रा अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र के टहरवाजिदपुर गांव निवासी विनोद सिंह की निकली। केवल पूर्व जिला पंचायत सदस्य थे। मगर आम आदमी से जुड़े हुए। यही वजह रही कि जब 45 साल की अल्पायु में 10 मार्च 2018 को उनका कैंसर की बीमारी की वजह से निधन हुआ तो उनके गांव से करीब 20 किमी दूर पवित्र दुर्वासा धाम तक उनका शव लोग अपने कंधे पर पैदल लेकर गये। शव ले जाने के लिए वाहन सजा हुआ साथ में खाली गया। इसके साथ ही करीब तीन किमी लम्बी कतार शवयात्रा में थी। लोग चीख-चीखकर रो रहे थे। सैकड़ों लोग अपना भाई-अपना बेटा बता रहे थे। इसके विपरीत हमें इस बड़ी शवयात्रा के बारे में केवल चार ईमानदार व्यक्तित्व ने सूचना दी। इन चार लोगों में कांग्रेस के जिला महामंत्री प्रवीण कुमार सिंह, बसपा के मेरे बड़े भाई मुस्तनीर फराही, देश के बड़े पत्रकारों में शुमार मेरे भाई व शार्प रिपोर्टर पत्रिका के संपादक अरविन्द सिंह जी व आजमगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार महेन्द्र सिंह सुनील जी। यह पत्रकारीय जीवन की आत्महत्या, पत्रकारिता के दीवालिएपन व गिरी हुई पत्रकारिता का एक उदाहरण नहीं तो और क्या है कि इतने बड़े सामाजिक कार्यकर्ता को अखबारों में समुचित जगह नहीं दी गयी। आज मुझे शर्म आ रही कि इतनी डिग्री लेने और इतने अच्छे परिवार में पैदा होने के बाद भी हमने संवेदनशील कहे जाने वाले इस संवेदनहीन पेशे को क्यों चुना। शायद इस देश में विनोद सिंह जैसे लोगों का यही हश्र होता है। इसका एक उदाहरण यह कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद पूरी दुनियां से शोक पत्र आये। सबसे छोटा व सबसे अच्छा पत्र यूरोप के महान विचारक जार्ज बर्नाड शाह का रहा। वह लिखे थे कि इट इज सो डैंजरस टू बी गुड इन आवर टाइम। यानि हमारे समय में इतना अच्छा होना भी कितना खतरनाक है। इसीलिए विनोद भाई के शुभेच्छुओं से यही कहेंगे कि सभी को क्षमा करना। जिस देश ने गांधी को नहीं समझा वह विनोद को क्या समझेगा। बस हम लोगों की ओर से उनको सादर नमन।

