वह भी क्या दिन थे, अठन्नी चवन्नी में ना जाने क्या-क्या मिलते थे

@ सीए रत्नेश कुमार सिंह…

हमारा प्रारंभिक 10 साल का स्कूल मऊ नगर के कमला शान्ति बाल विद्यालय के साथ ही लगा सोनी धापा बालिका इंटर कालेज और मऊ का विश्वविद्यालय कहा जाने वाला डी सी एस के पी जी कालेज था। हमारे स्कूल में एक चाची दोपहर के ब्रेक में आया करती थी जो मौसमी फलों की टोकरी भर कर सर पर रखकर आती थी और सिर्फ उन्हें ही स्कूल के अंदर आकर फलों की बिक्री की इजाजत थी। हां गर्मियों के मौसम में पों-पों, भोंपू वाला 10 पैसे का बर्फ और अठन्नी रुपया वाला आइसक्रीम और शंकर की मलाई कुल्फ़ी सहित बाकी हमेशा छुट्टियों के समय प्याज मिर्च 12 मिक्चर नमकीन, चूरन, सोन पापड़ी के खोमचे, कभी-कभी आलू कचालू वाले स्कूल के बाहर डेरा जरूर लगाये रहते थे।

तब क्वालिटी वाल, अमूल, मदर डेयरी के चमचमाते आइसक्रीम के फ्रिजर वाली चलती फिरती दुकानें वहाँ तक नहीं पहुँची थी। स्थानीय स्तर पर ही गुप्ता आइसक्रीम और अन्य ब्रान्ड़ की दुकानें स्टैंडर्ड मानी जाती थी। हां इन सबपे शंकर की देशी स्टाइल में ठेले पर बर्फ की सिल्ली रखकर जमाई जाने वाली “मलाई कुल्फ़ी” भारी जरूर पड़ जाती थी। पों-पों वाले 10 पैसे वाले बर्फ बेचने वालों को स्कूलों के बाहर बेचने पर कभी-कभी प्रतिबंधित भी किया जाता था।

कमला शान्ति के प्रिय मित्र रोहित रूंगटा के पारिवारिक प्रतिष्ठान गगन दीप, मंगल दीप, और अमर दीप थी। उसमे इलेक्ट्रॉनिक शॉप गगन दीप में 50 रूपये की उस समय की विलासिता वाली आइसक्रीम आयी थी जो उस समय मऊ शहर में कौतूहल का विषय बनी थी।पर अफसोस यहां फ़्री वाली सुविधा नहीं मिली थी।

तब अठन्नी की क्रीम वाली आइसक्रीम को स्टैंडर्ड और कटोरी वाली को अव्वल दर्जे का माना जाता था। एक आइस्क्रीम ब्रान्ड़ डी ए वी इंटर कालेज में बनने वाले हमारे परम मित्र सन्तोष मद्धेशिया जी “हाफ़ टिकट किड्स कलेक्शन” का भी था। हालांकि तब उनसे मेरी जान पहचान नहीं हुई थी पर पारिवारिक सम्बंध होने से उनके घर में जाकर आइस की सिल्ली और आइस्क्रीम को नजदीक से बनते देखने का सौभाग्य मिलता था और तबकी स्टैंडर्ड मानी जाने वाली अठन्नी की आइसक्रीम भी फ़्री में भी खाने को हर बार मिलती थी। आज भी ये सारे चीजे अमूमन देखने को मिल जाती हैं पर-

कडक आवाज में बोलती थी, मगर कभी नहीं अपने बच्चों को ठगती थी, उपर से वो बच्चों से सख्त बहुत मगर अंदर से आत्मीयता झलकती थी। बिक रहे हैं स्कूलों में अब चाऊमीन पिज्जा बर्गर और मोमोज बासी, कहाँ खो गई स्कूलों में वो अमरूद, बेर और इमली बेचने वाली चाची। आती थी दुपहरी इंटरवल में पहनकर वो रंग बिरंगे किनारे वाली साड़ी, सर पर रखकर फलों की टोकरी हाथों और पैरोंं में मोटी-मोटी सी चांदी।

मिलता था पैसा घर से पर ना थी इजाजत स्कूल में बाहर के खाने की छूट, बच्चे पाते थे 10 पैसा 20 पैसा चवन्नी अठन्नी नही तो घर में जाते थे रूठ।

बिक रहे हैं स्कूलों में अब चाऊमीन पिज्जा बर्गर और मोमोज बासी, कहाँ खो गई स्कूलों में वो अमरूद, बेर और इमली बेचने वाली चाची।

चाऊमीन पिज्जा बर्गर को खाने में कहाँ है वो चाची के ताजेज़ताजे फलों वाली बात, पिज्जा बर्गर की दुकानें तब तक देंगी जब तक साथ देगा आपके बच्चे का स्वास्थ्य।

कैन्टीन के नाम पर स्कूल कर रहे है बच्चों के स्वास्थ्य के नाम पर खिलवाड़, जगह-जगह हो गई है डोमीनो, पिज्जा हट और मोमोज सेंटर की भरमार।।

अगली यादें

डी ए वी का मुन्ना ब्रेड पकौड़ा, बादाम पट्टी, समोसा और दादा का लवन्गलत्ता

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