अपना भारत

संसद भी मौन है! और कानून भी सो रहा है !

“Women’s day” की अपनी अलग ही महत्ता है और यह महत्ता तब और बढ़ जाती है जब इसकी संस्कृति व पृष्ठभूमि भारतीय संस्कार से जुड़ी हो। वैसे तो एक कहावत है कि हर सफल पुरूष के पीछे किसी न किसी स्त्री का हाथ होता है। यह सौ फीसदी सच भी है। लेकिन इस कहावत से हट कर मेरा यह कहना है कि जब पुरुष ही स्त्री के गर्भ में पल्लवित और पुष्कित होता है तो सफलता के पीछे हाथ होने का आशय ही कहां शेष बचता है। ऐसे परिस्थिति में तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि मां का गर्भ एक मंदिर होता है और इसी मंदिर में हर व्यक्ति का निर्माण होता है। सफलता की पहली सीढ़ी तो यही है। इसलिए हर व्यक्ति के जीवन में मां जैसा अनमोल रिश्ता और मां से बड़ा योगदान किसी और का नहीं होता है।
“Women’s day” पर बधाई देना और लेना दोनों अच्छी बात है। एक महिला को जब कोई बधाई देगा तो उसका खुश होना लाजिमी है। वैसे ही एक पुरुष जब किसी महिला को बधाई देगा तो वह खुश होगा तभी देगा।
मां के अलावा इस रिश्ते के सागर में बहन, पत्नी, बेटी, भाभी व दोस्त सहित अन्य रिश्तों का समागम होता है। बहन से तो लड़ने झगड़ने की उम्र कब बीत जाती है और कब वह दूजे की अमानत हो जाती है पता नहीं चलता। जब बेटी जिन्दगी में आती है तो वह हर रिश्तों के बंधन का एहसास कराती है। भाभी व दोस्त तो हमेशा प्रेरणादायी बनकर जीवन को राह दिखाने की कोशिश करते रहते हैं। ऐसे में मां के बाद किसी पुरुष के पीछे अगर कोई दूसरी महिला साया की तरह साथ रहती है, साथ देती है, सुख दुःख में पास रहती है, लड़ती- झगड़ती रहती है, तो वह होती पत्नी। वास्तव में मां के बाद प्रेम की प्रतिमूर्ति होती है तो वह पत्नी ही होती है। जिसके पास है तो वह अजर-अमर है जिसके पास नहीं है तो वह जिन्दा होकर भी मरे के समान है। आज कल देश में इसी रिश्ते में सबसे ज्यादा बिखराव व विघटन की स्थिति है। इस बिखराव से परिवारों में ज्यादा चिन्ता तो है लेकिन वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते क्योंकि कानून के सहारा की बदौलत लोग बेसहारा हो रहे हैं।यहाँ पर हमारे माननीय की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए लेकिन वह भी मौन हैं और खुद वे और उनका परिवार इस कलंक की जद में हैं!
जनपद न्यायालय में पारिवारिक न्यायालय की संख्या एक से दो और दो से तीन होती जा रही है सरकार को पता है कि इन मुकदमों में तलाक की स्थिति क्या है लेकिन विडंबना देखिए की संसद भी मौन है और कानून भी सो रहा है।

खैर सभी को women’s day की हार्दिक बधाई।

women’s day पर यह लेख हमने 8 मार्च 2020 को लिखा था, इसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है, इसलिए अक्षरशः पुनः प्रेषित किया।

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