खास-मेहमान

स्वयं के साथ गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाए : श्री श्री रवि शंकर

गुरु पूर्णिमा हम पूर्णिमा के दिन मानते हैं। मन का संबंध चन्द्रमा से होता है और पूर्णिमा के चाँद का अर्थ है सम्पूर्णताए उत्सव और शिखर। इस दिन हम प्रेम और ज्ञान का उत्सव मानते हैंए क्यूंकि पूर्णिमा का एक अर्थ प्रेम और ज्ञान के संग उत्सव मनाना। यह दिन है कृतज्ञता काए जो कुछ भी हमको मिला है उसके प्रति कृतज्ञ हो जाएँ और उस आनंद को लोगों के साथ बाँटने के लिए प्रतिबद्ध हो जांए। उत्सव मनाये और गुरु परंपरा के प्रति कृतज्ञ हो जाएं, स्वयं को धन्यभागी महसूस करें के आप गुरु शिष्य परंपरा का हिस्सा हैंए यह वह परंपरा है जिसने ज्ञान को न सिर्फ़ संजोया हैए बल्कि अनंत काल से उसे लोगों के साथ बांटा भी है। जितनी ज़्यादा श्रद्धा और कृतज्ञता हम में होगी उतना ही आशीर्वाद हमें हमारे गुरु का प्राप्त होता है। जितना आशीर्वाद प्राप्त होगा, उतना ही ज्ञान और आनंद हमारे जीवन में बढ़ता चला जाएगा। यह किसी को भी नहीं मालूम की इस परंपरा की शुरुवात कब और कैसे हुई। इस पृथ्वी पर अरबों सालों से महापुरुष, ऋषि, महात्मा जन आते रहे हैं और आगे भविष्य में भी आते रहेंगे। हम पहले के, अभी के और आने वाले सभी गुरुजनों की प्रति कृतज्ञ होते हैं, जिन्होंने ज्ञान की धारा को रुकने नहीं दिया और आगे भी इस ज्ञान रुपी धारा से इस धरा को पवित्र करते जाएंगे।

आध्यात्म के पथ पर आने से हमारे जीवन में आये बदलावों के लिए हमें कृतज्ञ होना चाहिए। ज्ञान के बिना जीवन अधुरा है, जीवन की शुरुआत ही ज्ञान से होती है। गुरु का अर्थ है वह जो विशाल है। जब गुरु तत्त्व का हमारे जीवन में प्रदर्पण होता है तब हमारी चेतना में ज्ञान का उदय होता है। जब सभी सीमायें, सभी बाधाएं समाप्त हो जाती है, जब आप न सिर्फ अपने आसपास के लोगों के साथए बल्कि संपूर्ण सृष्टि के साथ एकता और एकरसता महसूस करते हो तो इसे ही गुरु तत्व कहते है। जब हमारे अपने लिए कोई इच्छा न होए कोई चाह न होए तब गुरु तत्त्व का हमारे जीवन में आगमन होता है। क्या आपने कभी जीवन में दूसरों के लिए कुछ ऐसा किया है जिसके प्रतिफल की भी आपने अपेक्षा न की हो। अगर ऐसा हुआ है, तो उस क्षण आपने उस व्यक्ति के जीवन में गुरु की भूमिका निभाई है।

हमारी माँ हमारी पहली गुरु होती हैं। फिर हमारे शिक्षक, जैसे वीणा वादन सिखाने वाले या कोई और। सद्गुरु हमें सत्य का ज्ञान देते हैं, परमसत्य से, अध्यात्म से परिचित कराते हैं। यह ज्ञान मिलने से पहले मैं कहाँ था, कहाँ हूँ। गुरु पूर्णिमा के दिन हमें जरूर यह चिंतन करना चाहिए।

जब आप यह जान जाते हैं की अगर जीवन में यह ज्ञान न होता या गुरु हमारे जीवन में न होते तो हमारे जीवन कैसा होताए तब आप में कृतज्ञता का भाव उमड़ता है। आप कितने सौभाग्यशाली है की मन और शरीर में होते हुए भी आप अपने भीतर उस अनंता की झलक प्राप्त कर सकते हैं। मन और शरीर की अपनी सीमा है लेकिन हमारी आत्मा की अभिव्यक्ति की कोई सीमा नहीं है।

एक साधक के लिए, गुरु पूर्णिमा नव वर्ष की भाँती की तरह है, यह पूरा वर्ष इस ज्ञान रुपी पथ पर रहने का और हमारे जीवन को उस दिव्य अनुभूति के ओर मोड़ने का त्यौहार है। एक वर्ष उस अनन्तता के साथ एक होने का और इस जीवन को, सृष्टि को गुरु की दृष्टि से देखने का, जो हमारे जीवन में मार्गदर्शन करने वाले सितारे की तरह है। इस स्तिथि या परिस्तिथि में मुझे वो करना चाहिए जो मेरे गुरु करते। एक बुद्धिमान व्यक्ति तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देता वो समझ बूझकर उत्तर देता है। इसमें आप तब ही पारंगत होंगे जब आप बार बार स्वयं को गुरु या प्रबुद्ध जन की स्थिति या परिस्थिति में डालेंगे ओर उनकी तरह सोचना शुरू करेंगे। अनंत धैर्य, विशाल बुद्धि, पूर्ण करुणा और निष्कलंक खुश रहने का प्रयास करके। हमें बदले में कुछ भी नहीं चाहिए, दूसरों को प्रेम करना और उनकी सेवा करना यह महत्वपूर्ण है। आम तौर पर, हम सोचते हैं की मैंने उस व्यक्ति को इतना प्रेम दिया, लेकिन उसने मुझे बदले में क्या दिया। इस तरह, हम दूसरे व्यक्ति को यह महसूस करने की कोशिश करते हैं कि हमने उन्हें प्रेम करके उनपर बहुत उपकार किया है। यह हमें नहीं करना चाहिए। प्रेम हमारा स्वभाव है। इसका मतलब है गरिमा, सहजता, करुणा और सादगी के साथ कार्य करना और हम यह गुण लेकर पैदा हुए हैं। अपने सभी गुणों को आत्मसमर्पण करें और एकदम खाली हो जाएं। गुरु तत्त्व के करीब आने के लिए, अपने सभी सकारात्मक और नकारात्मक गुणों को आत्मसमर्पण करें और खुश रहें। आपको यही करने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

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