प्यार की जीत
“अरे! भैया, जरा जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ . यार ! पैसे पूरे लेते हो तो काम भी जरा जैम के करो . मिलता हूँ जरा बाहर का काम निपटाकर .” और वह मजदूरों को संबोधित कर बाहर निकल गया .
कुछ देर बाद पत्नी चाय और ब्रेड स्लाइस ले आई .
“इधर आओ सब. पहले चाय पी लो और इस काम को देख लो . शाम को मुझे सुनना न पड़े .”
“बीबी जी ! आप चिंता न करो सब हो जाएगा.”
चाय और ब्रेड खाते ही वे सब काम पर लग गए .
“अबे ! क्या कर रहा है ? खैनी बाद में खा लेना . बीबी जी बोली हैं न पहले काम कर ले .” एक मजदूर साथी को डांटते हुए बोला .
उसने खैनी को एक तरफ फेंका और जुट गया काम में . दो घंटे बाद पति वापिस आया तो सभी मजदूर आराम से बैठे हुए थे .
“क्या हुआ ? काम नहीं करना है क्या ?”
“बाबू जी ! काम तो हो गया . पर बीबी जी के कहने से हुआ है . बीबी जी जानती हैं कि हम भी इंसान हैं . आप मजदूर समझ रहे थे . बोल में मिठास का पैसा नहीं लगता साहब .”
पत्नी प्यार की जीत पर मुस्कुरा रही थी .
शब्द मसीहा

