मदद या बदला
ऑफिस के उस दोस्त कि बदतमीजी पर बहुत गुस्सा था मुझे. यूँ तो कम ही गुस्सा आता है मगर उस पर मुझे बहुत अधिक गुस्सा था . जब भी सामने पड़ता तो एक कसक सी उठ जाती मन में . कई बार सोचा कि बदला लूँ मगर मेरी प्रकृति ऐसी नहीं थी सो बदला नहीं लिया .
मैं ऑफिस में बैठा हुआ था तभी मेरा अर्दली आया और बोला – “साहेब ! आप कमरे से बाहर की भी कोई खबर रखते हैं या नहीं ? मालूम है आपको सब लोग प्रमोद बिहारी जी के यहाँ जा रहे हैं . उनकी बेटी की स्कूटी का एक्सीडेंट हो गया है . सिर में गहरी चोट लगी है .”
“ओह! बहुत दुःख हुआ. प्रभु सबका भला करें . कहाँ ले गये हैं बच्ची को ?” मैंने पूछा .
“साहेब ! उसको वहीं प्राइवेट अस्पताल में ले गये हैं और उसके सिर का ऑपरेशन करना पडेगा .” अर्दली बोला .
अब मेरा भी मन खराब हो गया था . दोस्त से ही मनमुटाव था परन्तु बेटी से क्या बैर . मैं मन ही मन सोच रहा था कि अर्दली फिर बोला- “साहेब ! आप जायेंगे तो ड्राइवर को बोलूँ गाड़ी लगाने को ?”
“नहीं, पहले एक काम करो तुम , मेरे लिए कुछ पैसे निकाल दो बैंक से . मैं चेक दे रहा हूँ और ड्राइवर को वापिस आते ही गाड़ी लगाने को कह देना .” मैंने कहा और जल्दी-जल्दी अपनी फ़ाइल निपटाने लगा .
कुछ देर बाद अर्दली आ गया और मेरा खाने का डिब्बा और सूटकेस गाड़ी में रखने के लिए उठाने लगा . साथ ही पैसे टेबल पर रख दिये . मैंने पैसे गिने और एक लिफ़ाफ़े में डाल लिए .
गाड़ी दौड पड़ी अस्पताल की ओर . अस्पताल पहुँचा तो काफी भीड़ थी . ऑफिस के भी कई लोग खड़े थे . बातें होने लगीं तब पता चला कि दो लाख रुपये की जरुरत है . मैं तो पचास हजार ही लाया था अपने साथ . खैर हिम्मत कर के मैं अंदर चला गया . लडकी का चेहरा पूरा पट्टियों से अटा हुआ था . ऐसा लग रहा था जैसे किसी फ़ुटबाल पर पट्टियां लपेट दी हों .
प्रमोद अभी यहाँ नहीं था . जैसे ही मुझे देखा तो वह रोने लगा . मैंने उसे हिम्मत बंधाई और बच्ची के बारे में पूछताछ की. साथ ही उसे सरकारी अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह के साथ मेडिकल सुपरिटेंडेंट से बात करने की बात कही मगर प्रमोद ने वहीं ऑपरेशन करवाने को तरजीह दी . बात जब पैसों की आई तो वह बोला-
” सर ! पैसे तो किसी तरह जुगाड़ कर लिए हैं पर मुझे पी एफ से भी जरुरत पड़ेगी यहाँ का खर्च सोलह से बीस हजार रोज का है . आप मेरी मदद कीजिये पैसे जल्दी दिलवाने में .”
मैंने उसे मदद का आश्वासन दिया और बच्ची के जल्द स्वस्थ होने की शुभकामनाएँ दीं. कुछ देर बाद मैं चलने को हुआ तब मैंने उसे गाड़ी तक आने को कहा . वह मेरे साथ आ गया .
“दोस्त ! मैं जानता हूँ कि मेरा यहाँ आना बेकार है . मैं तुम्हारी बच्ची के लिए कुछ नहीं कर सकता मगर एक चीज है जो तुम्हारी मदद कर सकती है .” और मैंने पचास हजार रुपये उसके हाथों में रख दिये .
“देखो अगर और जरुरत पड़े तो बिना संकोच फ़ोन कर देना मुझे . पी एफ के पैसे निकालने की जरुरत नहीं पड़ेगी . दो चार महीने में वापिस कर देना जब बेटी ठीक हो जाय .”
मेरे ऐसा कहते ही प्रमोद ने मुझे सीने से लगा लिया और बोला – ” सर! मुझसे इतनी बड़ी गलती के बाद भी आप मेरी मदद कर रहे हैं ?”
“अरे! नहीं , ये सब चलता रहता है . जिन्दगी का हिस्सा है . बच्चे सब के एक जैसे होते हैं और असली धन हैं . अगर मेरा कोई सहयोग तुम्हारी परेशानी दूर कर सकता है तो ये मेरा फ़र्ज़ है .” मैंने कहा .
“सर! फर्ज़ तो मेरा भी बनता है . ये लीजिए चप्पल ….” और उसने अपना सिर झुका दिया .
मैंने उसे गले लगाया और उसकी पीठ थपथपाई . अब मैं भी कुछ बोलने की हालत में नहीं था . मैं गाड़ी में बैठ वापिस लौट लिया था . मालूम नहीं ये मदद थी या बदला .
शब्द मसीहा

