चर्चा में

मेरे शहर में… गैरों पे करम, अपनों पे सितम…..

मेरे शहर में….

संजय दुबे (वरिष्ठ पत्रकार )

गुरु! शुरू,शहर की सरकार की क़वायद। सारे शूरमा चुनाव के साजो सामान संग मैदान में। एक से बढ़ कर एक चुनावी जीत के फार्मूलों से लैस। जाति, मज़हब, खित्ते, वफ़ादारी, गद्दारी। सब है। सबके पास। कोई किसी से कम कहां है? अभी अध्यक्षी उम्मीदवारी को ही लेकर कश्मकश की कसक दिख रही है। चुनावी तपिश बढ़ने तक अभी इहै चलेगा।जैसे ही नाम घोषित हुए, आदतन चक्कलस चालू हो गयी है। केहू हेने मुँह फुलाएं बैठा है केहू होनें। काहें? काहें का,टिकस काट के नेताज़ी का दूसरे को थमा दिया।
लग रहा है नेता तो नेता पार्टियों सब गणित कर रही है। बताइये! साल भर से नेताज़ी के फ़ोटो इ चौराहा, ऊ मोड़, हेने वाली गली, होने वाले रस्ता पर टंगी है अउर टिकस? कउनो दूसरे नेता ज़ी को। अब आपे बताइये, वफ़ादारी कहां अउर केकरे संग है? अइसा नहीं लगता कि इ, बकलोली है। भोटर का क्या है? ओकरा तो भोट देना है ऊ केहू न केहूको देबे करेगा। फलांने को, ढ़ेकाने को। नहीं समझ में आएगा तो नोटा को दे देगा, पर देगा जरूर। काहे कि सगरी लोकतंतर की जिम्मेदारी ओकरे है? बाक़ी, पार्टी सब खाली राजनीती के लिए है। ओकरा,जे मन को भायेगा, टिकस, उहै पायेगा। बाकिर सब,…. घंटा बजायेगा। बताइये!न ज़ी। इहौ कौनों बात हुई, साइकिल चलाते चलाते सगरी कोलेस्ट्रॉल डिसॉल्व हो गया अउर गाड़ी पे चढ़ने का नंबर आया तो, नेताज़ी ने नेताज़ी को पैदल कर दिया। ऊ तो नहीं रहता उनकरा जोगाड़ तब,हो न जाता तियां पांचा। ख़ूबे न खेला किया पार्टियों सब। सगरी वफ़ादारों को बहरे कर नया अदमियों को भीतर ढुका लिया। इ,हम नहीं कह रहे है ऊ कह रहे है,जिनकरा,पार्टी से टिकस कटा है।अइसा नहीं है कि पार्टी सब बेवकूफ़ है। राजधानी वाले नेताज़ी से बात हुई तब ऊ का कहें सुनिए!” देखिए भाई ज़ी। इ सब राजकाज़ है। आना जाना लगा रहेगा। एक, जाएगा दो,आएगा। परिवारों में गणितबाज़ सब रहता है इ तो पार्टी है। इहाँ तो सबै बावन हाथ के है। दो चार दिन में सब ठीक हो जायेगा। जिसको जो बुझाएगा, उहै ऊ गाएगा। ”
अब, आपै बताइये कउन सही है अउर कउन गलत? गद्दार कि वफ़ादार? कंगाल या मालदार? टिकाऊ अउर शानदार? मुँहफट या समझदार?…. एतना माथा मत लगाइये, चानि पे हिमगंगे तेल चेपना पड़ जायेगा। राजनीति है, अलज़ेबरा नहीं। इहाँ कउनो फार्मूला सेट नहीं है। सबै, भगवान भरोसे है। पर्टियों सगरी अउर नेतागण भी। भोटरों सब भी। चिंता छोड़िये-
तनी सुनिए न, गुरु!रेडियो बजाइये मऊ वाला एफएम। देखिए न,का जनी कौनों बढ़िया गाना बज रहा हो।…. अरें!ग़ज़ब गुरु ग़ज़ब! इ तो बड़ा सटीके गाना लता दीदी का बज रहा है…….गैरों पे करम…. अपनों पे सितम…. ए जानें वफ़ा ये….. जुल्म न कर…। लग रहा है रेडियो टीशन को भी पता चल ही गया है कि शहर की राजनीति में झामे झूम चल रहा है। ओहिके देख के सब आजकल गाना बज रहा है…..।

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