चर्चा में

पालिका चुनाव : दलित मुस्लिमों के हाथ चुनाव परिणाम

@ संजय दूबे ( वरिष्ठ पत्रकार)

इस बार पालिका चुनाव रोचकता से भरपूर रहेगा या एकतरफ़ा? आने वाले कुछ दिनों में साफ़ हो जायेगा। अभी, सभी जीत रहें है। जीतने के आंकड़े भी अब बताने लगे है। जितना आसान चुनाव लग रहा है दरअसल, उतना आसान है नहीं। अभी तक़ यहां तक़रीबन पहले के चुनावों में कुछ दिनों पूर्व ही ये दिखने लगता था कि चुनाव कौन जीतेगा? इस बार भी दांवे किये जा रहें है। मग़र,अबकी मंजर कुछ अलग है। भाजपा ने दलित उम्मीदवार उतार कर इस सीट पर मुकाबला रोचक बना दिया है। हालांकि इससे भाजपा से होने वाले संभावित सवर्ण उम्मीदवार नाराज बताये जा रहें है। सामान्य सीट अबकी होने से उन्हें अपनी उम्मीदवारी पर पूरा भरोसा था। पर,पार्टी ने उनके उम्मीदों पर पानी फेर दिया।अभी अंदर खाने से ये ख़बर आ रही है कि कुछ नेताओं ने चुनाव में तटस्थता अपना भी ली है।पार्टी लगातार इस पर अपना पूरा ध्यान लगाए हुए है। एकाध दो दिनों में पार्टी के बड़े नेताओं का यहां आने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।सवर्ण, दलित, मुस्लिम और अन्य वर्ग के नेताओं के दौरे यहां लगेंगे। जो,पार्टी के नाराज नेताओं को मनाने के साथ -साथ कार्यकर्ताओं में भी जोश भरने का काम करेंगे। दरअसल,भाजपा ने दलित प्रत्याशी उतार कर दलित वोटरों को अपनी तरफ़ पूरी तरह से करने की कोशिश की है। हो सकता है ये उसका एक प्रयोग भी हो।उसे लग रहा हो कि अगर ये बसपा का कैडर वोट उसके साथ जुड़ जायेगा तब परिदृश्य कुछ और होगा। ये प्रयोग, आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों को भी प्रभावित कर सकता है।करेगा भी। कितना करेगा? पालिका चुनाव परिणाम पश्चात् पता चलेगा।
भाजपा, दरअसल,अबकि बढ़े वोटरों उसमें भी दलित वोटों को अपने पाले में करने के लिए जी जान से जुटी है।उसे पता है कि पालिका परिषद में लगभग 42 फ़ीसद हिन्दू वोटरों में दलित वोटरों की तादाद लगभग 10 फ़ीसद से कुछ ज़्यादा है। जो, हराने जिताने के लिए काफ़ी है। इसलिए, भाजपा,जो कभी भी यहां मुख्य लड़ाई में नहीं रहती थी,दलित उम्मीदवार उतार लड़ाई में आ चुकी है। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि अन्य दल अब सीधे अपनी लड़ाई भाजपा से बता रहें है। इसका वोटरों पर क्या असर होगा? ये,वोटिंग के बाद पता चलेगा। फ़िलहाल भाजपा चर्चा की लड़ाई में आ चुकी दिख रही है। सपा, बसपा सभी अपनी लड़ाई भाजपा से बता रहें है।
भाजपा से लड़ने में जहाँ तक़ सपा, बसपा के दांवे की बात है तब यहां फ़िलहाल बसपा, सपा में एक दूसरे से आगे दिखने कि होड़ दिख रही है। वोटरों के बीच दोनों पूर्व चेयरमैनों की चर्चा है। जिनमें एक, फ़िलहाल हाथी पर सवार हैं । ज़बकि दूसरे, सपा के सायकिल सवार के साथ हैं। मुस्लिम वोटों की जहाँ तक़ बात है तब हमेशा से ये देखा गया है कि ये,जहाँ जायेंगे, जीत, वहां होगी। ये, हर बार हुआ है। पूर्व के जितने भी चुनाव हुए है, पालिका परिषद, विधानसभा, लोकसभा, उनमें जीता वहीं है जिसे मुस्लिम मत एक तरफ़ा मिलें है। लिहाज़ा, इन वोटरों के लिए सपा, बसपा में काफ़ी कश्मकश चल रही है। दोनों दल इनको अपने साथ बताने, दिखाने का दावा कर रहें है। ऐसे में, ये तय है,मुस्लिम वोट जिधर जायेंगे, जीत की तरफ़ वो पार्टी बढ़ेगी। इन वोटों कि अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि सपा, बसपा, प्रत्याशी इन्हें अपने साथ होने का दावा करते, बताते फ़िर रहें हैं। सपा प्रत्याशी जहाँ इसे अपना परम्परागत वोट बता रहें हैं वहीं बसपा प्रत्याशी इन्हें अपने नाम के साथ जुड़ा बता रहें हैं। उनका दावा है कि ये वोट इनकी तरफ़ ही जायेंगे। क्योंकि पालिका सहित हर मुद्दों पर चाहें वो प्रदेश स्तरीय रहें हो या राष्ट्रीय स्तरीय, उन्होंने पुरजोर आवाज़ में यहां के लोगों की बात उठायी हैं। इतना ही नहीं उनका दावा तो यहां तक़ हैं कि भाजपा के सवर्ण मतदाता भी उन्हें ही वोट करेंगे। उनका ये विश्वास कहां तक़ सही है ये, चुनाव परिणाम के बाद पता चल पायेगा। पर, इतना तय है कि ऐसे में पालिका परिषद के चुनाव में जहाँ मुस्लिम वोटों का बड़ा रोल पहले से ही रहा है वहीं, दलित वोट भी अबकि बड़ी भूमिका में नज़र आ रहें हैं। ये तय हैं कि कोई भी उम्मीदवार, इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता चाहें वो जिस भी दल से हो। हाँ! ये तय हैं कि ये जिधऱ जायेंगे, जीत वहां होगी। अब देखना ये हैं कि इस चुनाव में ये किसे अपने वोटों से नवाजते है और किसे चेयरमैन बनाते है।

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