कविता : गर्मी
@ राजेश कुमार सिंह…
मई-जून की गर्मी जब,
अपना रौद्र रूप दिखाती है।
पशु-पक्षी लोग-बाग को,
यह विचलित कर जाती है।
देख तपिस दिवाकर की,
सभी बेचैन हो जाते हैं।
हम हैं जिम्मेदार कितने,
यह कभी न सोच पाते हैं ।
विकास की अंधी दौड़-भाग में,
हम केवल इतराते हैं।
दिखावा नित्य मानवता की करते,
वास्तविकता से नज़र चुराते हैं।
दोषारोपण कर सभी दूसरों पर,
अपना दायित्व भूल जाते हैं।
जाते नहीं प्रकृति के करीब,
साईबर की दुनिया में समय बिताते हैं।
विकास की अंधी दौड़-भाग में,
हम अपना कर्तव्य कहां निभाते हैं।
रचनाकार… राजेश कुमार सिंह – मऊ, उत्तर प्रदेश ( लेखक स्वतंत्र स्तम्भकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं । यह उनका कविता लिखने का दूसरा प्रयास है। मो. नं. 9415367382


