अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर नारी के प्रत्येक स्वरुप को शत्-शत् नमन्
इस एक दिन पूरे विश्व के सामजिक संगठनों को महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा, स्वास्थ्य आदि सब की चिन्ता सता जाती है और फिर उसके बाद स्थिति पुर्वत हो जाती है।
हमारे समाज के कुछ बुद्धिजीवी महिलाएँ महिला उत्थान केंद्र खोल कर नारी के सशक्तिकरण की बात करती हैं, तथाकथित ये संगठन नारी मुक्ति की बात करते हैं । यह अभिमान और आधुनिकता को छोड़कर कुछ और नहीं प्रतित होता है इन संगठनों में ।
एक नारी भला किससे मुक्ति चाहेगी उस पिता से जिससे उसे संसार में पहचान मिली या उस भाई से जिसके साथ होने पर वह स्वयं को निर्भीक समझती है या उस पति से जिसके लिए वो अपने माता,पिता भाई,बहन और सखी सहेलियां सब छोड़ देती है या फिर उस संतान से जिसके लिए उसने हर कष्ट सह कर भी असीम आनन्द का अनुभव करती है या उस मकान से जिसको घर बनाने में वह अपना अस्तित्व मिटा देती है।
एयर कंडीशन घर में पार्टी करना,गाड़ी में लांग ड्राइव पे जाना,गोष्ठियों में भाषण देना,बुजुर्ग सास-ससुर को ब्रेड-बटर खा के सो जाने का आदेश देकर स्वयं पंचसितारा होटल में डिनर करने वाली के लिए पति से आउट ऑफ़ बजेट गिफ्ट लेना भर महिला दिवस मनाना हो सकता है क्या ?? सम्भव है इन संगठनों के मतानुसार महिला दिवस का उद्देश्य यही हो।
मेरे विवेकानुसार परिवार क्रंदन करना, सम्बंधों का हनन करना, आर्थिक या नैतिक रूप से असहाय पति का सहयोग न करके जीवन की कठिनाइयों को बढ़ा देना मुक्ति नही हो सकता है।
नारी को समाज से नहीं बल्कि समाज में व्याप्त रूढ़ियों से मुक्ति चाहिए, उस विचारधारा से मुक्ति चाहिए जिसने नारी का नैतिक हनन कर रखा है, उस विज्ञान से मुक्ति चाहिए जिसने जो नारी को कोख में विनष्ट करता है, उस पुरुषवर्ग से जो वैश्यालयों की सराहना करता है, और उस सोच से मुक्ति चाहिये जो कहती है कि “साधारण सोच और अपनी गरिमा को स्थापित रखने वाली लड़कियों का जीवन चूल्हे से शुरू होकर बिस्तर पर समाप्त हो जाता है।”
महिला दिवस की सार्थकता तो तभी पता चल सकता है कि जब पुरी ईमानदारी से यह सर्वेक्षण कराया जाय कि— नारी अधिकार चाहती है या अपनों का प्रेम सम्मान व साथ मुझे लगता है कि प्राप्त उत्तर से ही महिला दिवस का भाव समाप्त हो जायेगा ।
मेरे इस लेख का उद्देश्य किसी का अपमान या उपेक्षा करना नहीं है, यदि किसी व्यक्ति या संस्था की भावनाएं आहत हुयी हों तो क्षमा प्रार्थी हूँ ।

