अपना भारत

तुम तो मुठ्ठी भर हो, तुम्हारा क्या, हम 140 करोड़ भारतीयों का भाग्य उलझ जाएगा

मेरी कलम से…
आनन्द कुमार

कमियाँ, दुश्वारियाँ
चलो छोड़ते हैं
नए भारत के नए आग़ाज़ का
सपना, चलो सच करते हैं।
पक्ष-विपक्ष दोनों ज़िन्दा रहेंगे
चलो मुद्दों से भटकना छोड़ते हैं
उनकी ज़िद्द थी, उनकी हसरत थी
उसे छोड़ो, वह हो गई पूरी।
चलो, अब फिर से संसद में बैठकर
सड़क, महंगाई व बेरोज़गारी
युवा, नारी और व्यापारी की बात करते हैं।
तुम ना उलझो, देश उलझ जाएगा
उम्मीद व विश्वास का हर साख उलझ जाएगा
तुम तो मुठ्ठी भर हो, तुम्हारा क्या,
आज हो कल बदल जाओगे
हम 140 करोड़ भारतीयों का भाग्य उलझ जाएगा,
सुनो, ठहरो, सोचो और समझो जरा
नई संसद पुकार रही है तुम चलो तो जरा
मर्म समझो देश का, कह रहा आनन्द
तुम वहाँ भी बैठ कर देश को सोचो तो जरा
बदलाव ला सकते हो तुम्हारे अंदर है ताक़त
तुम अपने शक्ति को तो पहचानो जरा।

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