प्रख्यात गांधीवादी-समाजवादी विचारक,एक्टिविस्ट,लेखक रघुठाकुर आजमगढ़ में
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#एकपरिचय:- रघु ठाकुर, जन्म:- 10 जून 1946, स्थान सागर,मध्यप्रदेश। माता-पिता:- स्व श्रीमती तुलसी बाई एवं स्व. भवानी सिंह
शिक्षा:- स्नातकोत्तर (राजनीति विज्ञान), विधि स्नातक
लेखन विधा:- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन:- विभिन्न विधाओं में नौ पुस्तकें प्रकाशित
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देश में गांधीवादी-समाजवादी चिंतक के रूप में ख्याति प्राप्त समाजसेवी एवं राजनीतिज्ञ रघु ठाकुर विचारक,एक्टिविस्ट, जननेता के साथ-साथ एक अच्छे साहित्यकार भी हैं। जनहित के हर मोर्चे पर खड़े दिखाई देने वाले रघु ठाकुर ने साहित्य सृजन का मार्ग क्यों चुना इस संबंध में वे स्वयं कहते हैं कि -‘‘साहित्य सृजन मेरे लिये अपनी सम्वेदनाओं से साक्षात्कार है। इसके माध्यम से मैं खुद को मांजता हूं तथा पाठकों के माध्यम से आमजन से संवाद करने का प्रयास करता हूं। मुझे साहित्य शौक नहीं बल्कि परिवर्तन के लिए काम का ही एक हिस्सा है तथा बौद्धिक जगत से जुड़कर आत्मचिंतन व अपनी कमियों को दूर करने का माध्यम है। साहित्य स्वतः से सवाल करने का भी मेरा माध्यम है जो आमतौर पर दूसरे मित्र या नहीं करते या नहीं कर पाते। मानवीय संवेदनाओं व पीड़ा को व्यापकता देना भी एक उद्देश्य है।’’

10 जून 1946 को माता श्रीमती तुलसी बाई एवं पिता भवानी सिंह के पुत्र के रूप में सागर में जन्में रघु ठाकुर बाल्यावस्था से ही चिंतनशील रहे। पीड़ित मानवता के प्रति संवेदनाएं उन्हें समाजसेवा के लिए प्रेरित करती रहीं। आरम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत शैक्षिक सीढ़ियां चढ़ते हुए उच्चशिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद विधि में स्नातक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने महात्मा गांधी के राजनीतिक एवं दार्शनिक विचारों का गहन अध्ययन किया। उनके मन पर महात्मा गांधी की समाजवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने राममनोहर लोहिया के विचारों को अपने मनोनुकूल पाया और उसे अपने जीवन में आत्मसात कर लिया। भारत में समाजवाद को ले कर हमेशा एक अस्पष्टता सी रही है। रघु ठाकुर इस अस्पष्टता को दूर कर के देश में एक समतामूलक समाज की संरचना करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। अपने अध्ययन काल से आज तक वे दलित, दमित एवं वंचितों के पक्ष में आवाज़ उठाते रहे हैं।
रघु ठाकुर ने डाॅ. लोहिया द्वारा प्रकाशित ‘जन’ तथा ‘मैनकाइंड’’ में लेखनकार्य किया। उन्होंने जार्ज फर्नान्डीज़ द्वारा प्रकाशित ‘प्रतिपक्ष’ तथा ‘दी अदर साईड’ में संपादन कार्य भी किया। वे सुल्तानपुर , उत्तरप्रदेश से प्रकाशित ‘‘लोकतांत्रिक समाजवाद’’ मासिक के संस्थापक सदस्य रहे तथा भोपाल, मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले ‘‘दुखियावाणी’’ का संपादनकार्य सम्हाल रहे हैं। वैसे वर्तमान में वे दक्षेस महासंघ के अध्यक्ष एवं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक परिदृश्य का आंकलन एवं चिंतन करते हुए अपने जिन विचारों को रघु ठाकुर ने लेखबद्ध किया है वे लेख ‘‘विमर्श’’ नामक पुस्तक में संग्रहीत हैं। इन लेखों में ‘‘ऊर्जा तो बहाना है, अमेरिका के साथ जाना है’’, ‘‘प्रजातांत्रिक पूंजीवाद बनाम साम्यवादी पूंजीवाद’’, ‘‘जरूरत है पांचाली जैसी तेजस्विता की’’, ‘‘भस्मासुर बनाओगे तो खुद कहां बच पाओगे’’, ‘‘वैचारिक अतिवाद के महल’’, ‘‘औद्योगिक आतंकवाद’’, ‘‘ गांधी राष्ट्रपिता क्यों है, गांधी तो विश्वपिता हैं’’, ‘‘कविता-लोक से बाजार तक’’, नक्सलवाद- प्रचार और तथ्य’’ जैसे लेख वर्तमान समाज में व्याप्त वैचारिक संकीर्णता को बेनकाब करते हुए वह आक्रोश व्यक्त करते हैं जिसके केन्द्र में सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान है। रघु ठाकुर कवि हैं,लेखक हैं,एक्टिविस्ट हैं,राजनीतिक विचारक हैं और एक भविष्य द्रष्टा हैं।
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