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पाॅच दिवसीय रोजगारपरक प्रशिक्षण हुआ संपन्न

मऊ। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, मऊ में दिनांक 19-23 अक्टूबर 2022 तक पांच दिवसीय रोजगार प्रशिक्षण विषयक तिलहन का बीज उत्पादन तकनीक पर संपन्न हुआ। जिसमें 20 प्रगतिशील किसानों ने प्रतिभाग किया।

केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ एल. सी. वर्मा ने बताया कि बताया कि सरसो का बीज उत्पादन करके किसान अपना बीज खुद तैयार सकते हैं जिससे उन्हें हर साल बीज बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
सस्य वैज्ञानिक डॉ. अंगद प्रसाद ने बताया कि बीज उत्पादन के लिए पांच चरण जैसे केन्द्रक बीज, प्रजनक बीज, आधारीय बीज, प्रमाणित बीज एवं सत्य बीज होती है। यदि किसान आधारीय बीज से बीज उत्पादन करता है तो उसे तीन सालों तक बीज बदलने की आवशयकता नही पड़ेगी और वह दूसरे किसानों को बीज उपलब्ध कराकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं।
मृदा वैज्ञानिक डा. चंदन सिंह ने बताया कि एक हेक्टेयर के लिए 4 किग्रा गेहूं का बीज और 50 किग्रा डीएपी तथा 10 किलोग्राम सल्फर की आवश्यकता होती है। लाइन में बुवाई करने से खाद एवं बीज सही जगह और उचित मात्रा में गिरता है इसलिए उत्पादन बढ़ जाता है। बुवाई 5 सेंटीमीटर गहराई पर होती है इसलिए जड़ों का विकास अच्छा होता है। हवाएं चलती हैं तो सिंचाई करने पर फसल गिरती नहीं है। इतना ही नहीं लाइन में बुवाई करने से अन्य शस्य क्रियाएं जैसे निराई-गुड़ाई मे भी आसानी हो जाती हैं।
फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा. लाल पंकज सिंह ने बताया कि धान के खेत में किसान बिना जुताई किए सीधे सुपर सीडर मशीन से लाइन में सरसो की बुवाई करें। इससे फसल अवशेष खेत में सड़ने से मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ने के साथ ही बीज, खाद एवं पानी की मात्रा कम लगेगी। खाद जो बुवाई के समय देंगे, उसका भरपूर लाभ भी पौधों को मिलेगा।
बीज प्रौद्योगिकी वैज्ञानिक डा. हिमांशु राय ने कहा कि किसान लाइन में बुवाई करके गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। सरसो की समय से बोयी जाने वाली प्रजातियों मे आरएच -0749, आरऍएच-0725, पूसा सरसो -30, गिरिराज प्रमुख है।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ जे के कुशवाहा ने बताया कि बुवाई से पहले मिट्टी की जांच अवश्य करायें। प्रशिक्षण के सफल संचालन के लिए डा. जी डी गुपता, आरके सिंह एवं आलोक कुमार का सहयोग काफी सराहनीय है।

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