मधुबन में हारने और जीतने का रोज बन और बिगड़ रहा है समीकरण

भाजपा, सपा, बसपा में त्रिकोणीय संघर्ष, कांग्रेस व वीआईपी, आप बिगाड़ रहे कई की गणित मधुबन
@ आनन्द कुमार…
मऊ। घाघरा की लहरों के समीप बसा मधुबन विधानसभा क्षेत्र इन दिनों सियासत के भवर में फंसता नजर आ रहा है। विधानसभा चुनाव 2022 में किसकी नैया पार लगेगी, किसकी नैया डोल रही है, कुछ भी कहना मुमकिन नहीं है। इस बार मधुबन पर बड़ों-बड़ों की नजर है। किसी को अपने पुत्र की राजनैतिक विरासत की ताजपोशी का इंतेज़ार है। तो कोई तीसरी बार विधायक बनने के लिए आतुर है। तो कोई दो बार विधायक रहने के बाद जनता की अदालत में अपना आखरी विधानसभा चुनाव लड़ने की दुहाई दे रहा है तो कोई, महिला होने के नाते अपने सादगी की बदौलत हर घर में सेंध लगाते हुए इतिहास बनाने को आतुर है। तो कोई खुद बागी बन कर नांव पर सवार होकर मधुबन की राजनीतिक लहरों में गोते मार रहा है, और जनता जनार्दन के बीच अपने सेवाभाव की बदौलत अपनी तस्वीर बनाने और दूसरे की बिगाड़ने में लगा है।
मधुबन की शहीदी धरती इन दिनों विधानसभा के राजनीतिक सियासत में खूब फल फूल रही है। यहां पर रोज समीकरण बन व बिगड़ रहे हैं। यहां कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है कुछ भी कहना संभव प्रतीत होता दिखाई नहीं दे रहा है। मधुबन का सियासी समीकरण भारतीय जनता पार्टी के मंत्री रहे और स्थानीय विधायक दारा सिंह चौहान के इस्तीफा देकर समाजवादी पार्टी का दामन थामने व घोसी से प्रत्याशी बनने के कारण, बिगड़ा तो बिगड़ता ही गया और सभी इस समीकरण में अनफिट महसूस करने लगे।
भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी रामविलाश चौहान मऊ में अपने पिता बिहार के राज्यपाल फागू चौहान के सियासत की विरासत संभालने के लिए आतुर हैं। उनके प्रत्याशी बनने के बाद से ही मधुबन क्षेत्र के भाजपा के सबसे बड़े नेता भरत भैया विरोध पर उतर आए। विरोध यहां तक किए की भाजपा से इस्तीफा देकर खुद वीआईपी पार्टी के नाव पर सवार होकर प्रत्याशी बन गए और उनके समर्थन में लगे एक दर्जन के आसपास लोगों को भाजपा से निकाल दिया गया है। ऐसे में अपने पिता की बदौलत रामविलाश चौहान परिचय के मोहताज तो नहीं है लेकिन क्षेत्र में उनको कहीं न कहीं परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
वहीं बसपा से सपा में आए, समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी उमेश चंद्र पांडेय मधुबन की धरती से तीसरी बार सदन पहुंचना चाहते हैं। वैसे तो यहां पर पार्टी ने पहले अपने कद्दावर नेता सुधाकर सिंह को प्रत्याशी बनाया था लेकिन कुछ दिन बाद ही टिकट बदलकर उमेश चंद्र पांडेय के नाम की घोषणा कर दी। ऐसे में वे क्षेत्र में खूब जमकर प्रचार कर तो रहे हैं लेकिन उन्हें तीसरी बार सदन पहुंचने के लिए काफी मेहनत करना पड़ रहा है। अगर अंदर खाने की बात पर विश्वास करें तो समाजवादी पार्टी के नेता सुधाकर सिंह अगर कहीं अंदर ही अंदर उमेश चंद्र पांडेय का विरोध करेंगे तो यह उनके लिए मुसीबत की बात होगी।
बहुजन समाज पार्टी ने हाथी की सिंबल पर डॉ. संजय वर्मा की पत्नी नीलम कुशवाहा को प्रत्याशी बनाया है। नीलम कुशवाहा प्रभारी बनते ही मधुबन के क्षेत्र में एक-एक गांव एक-एक घर में दस्तक दे चुकी हैं। वे लोगों के बीच अपनी सादगी और सरल व्यवहार की वजह से काफी जगह बनाती जा रही हैं। महिला प्रत्याशी होने की वजह से घर के अंदर किचन से लेकर बेडरूम तक पहुंच वे लोगों से आसानी से मिल लें रही हैं।
कांग्रेस में दो बार विधायक रहे अमरेश चंद्र पांडेय पर दांव लगाया है अमरेश चंद पांडेय क्षेत्र में लोगों से अपना अंतिम चुनाव होने का वादा कर जनता की भरोसा मांग रहे हैं उन्हें यह विश्वास दिला रहे हैं कि वह उन्हें वोट दे दें अब वह दोबारा कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे ऐसे में उनकी इस बात पर जनता के बीच में का भी काफी प्रभाव पड़ रहा है लेकिन बसपा से भी ब्राह्मण प्रत्याशी आ जाने के कारण उनके चुनाव पर काफी असर पड़ा है। ऐसे में अमरेश पांडेय अगर अपना खेल बना नहीं पाए तो दूसरे का खेल जरूर बिगाड़ देंगे इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
वहीं कभी भाजपा के लिए जीने और मरने की कसम खाने वाले भरत सिंह (भरत भैया) ने मधुबन से बाहरी प्रत्याशी को टिकट देने तथा उनका उनका टिकट काटने पर नाराज होकर ना सिर्फ भाजपा से इस्तीफा दे दिया बल्कि बिहार की वीआईपी पार्टी की नाव पर सवार होकर मधुबन विधानसभा के चुनाव में गोते लगा रहे हैं। भरत भैया अपना खेल बना पाएंगे कि नहीं बना पाएंगे यह तो भविष्य के गर्त में है। लेकिन उनकी मजबूती और उनके समर्थकों तथा क्षेत्रीय जनता का मिल रहा उनको स्नेह, कहीं ना कहीं किसी और का खेल बिगाड़ रहा है, इस बात को न नकारा जा सकता है और न झुठलाया।
मधुबन में भाजपा, सपा, बसपा कांग्रेस व वीआईपी सहित कुल 12 प्रत्याशी मैदान में हैं। फौजी किशनलाल गोंड आम आदमी पार्टी से, दिनेश जन अधिकार पार्टी, रामप्रवेश राष्ट्रीय समाज दल आर, निर्दलीय रविंद्र, सूर्य कुमार दुबे, सुशील, सूरज कुमार पांडेय मैदान में हैं। कुल ले देकर मधुबन में लड़ाई बहुत टफ है। यहां पर त्रिकोणीय लड़ाई से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यहां पर खेल बिगाड़ने में वीआईपी पार्टी के भरत सिंह समाजवादी पार्टी के टिकट से बेपटरी हुए सुधाकर सिंह एवं आम आदमी पार्टी सहित अन्य निर्दलीय कई बड़े सुरमाओं का खेल बिगाड़ रहे हैं। ऐसे में कौन मधुबन का विधायक होगा यह तो 10 मार्च को ही पता चल पाएगा। लेकिन मधुबन में हारने और जीतने का समीकरण रोज बन और बिगड़ रहा है।



