माँ सब जानती है, इक वही है, जो हमे पहचानती है

@मान बहादुर सिंह मानु…
जान लेती है
पता नही कैसे-कैसे
पहचान लेती है
पता नही कैसे-कैसे ?
हमने कुछ भी नही
खाया देर से . . . . .
संतापों को सहते-सहते
हंसते-हंसते बुझ गयी
अंतिम चिराग़ की तरह
यदा कदा आज भी
लड़खड़ाता हूँ जब कभी
कहती है आज भी
कब तक गिरोगे
एक बच्चे की तरह …….
माँ सब जानती है
“इक वही है,,
जो हमे पहचानती है _


