खास-मेहमान

”कंथा” साधारण उपन्यास नहीं, लीजेंडरी कृति : इंदीवर पांडेय

० उपन्यासकार श्याम बिहारी श्यामल का ‘अंतर्नाद सम्मान’ से अलंकरण
० गीतकार पुरुषार्थ सिंह के खंड काव्य ‘गीता के गीत’ का लोकार्पण
वाराणसी । प्रसिद्ध समालोचक व प्रसाद-साहित्य के विशेषज्ञ डा. इंदीवर पांडेय ने कहा है कि ”कंथा” कोई साधारण उपन्यास नहीं बल्कि साहित्य जगत की ‘लीजेंडर ‘ कृति है। जयशंकर प्रसाद के जीवन और उनके युग को वृहत उपन्यास के रूप में लेकर साढ़े आठ दशक बाद उपस्थित इस कृति का पूरे हिंदी जगत में जैसा स्वागत हो रहा है, काशी में भी ऐसा ही होना चाहिए। इस कृति को साकार कर श्याम बिहारी श्यामल ने बड़ी और यादगार भूमिका निभाई है, जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। डा. पांडेय अस्सी से राजघाट के बीच बजड़े पर चल रहे समारोह के प्रथम सत्र में श्यामल को ‘अंतर्नाद सम्मान ‘ प्रदान किए जाने के बाद अपने उद्गार व्यक्त कर रहे थे। आरंभ में आयोजकों ने माल्यार्पण और पुष्प-गुच्छ भेंट कर भारतेंदु कुलोद्भव दीपेशचंद्र और प्रसिद्ध कथाकार सविता सिंह का स्वागत-सम्मान किया। दूसरे सत्र में प्रसिद्ध गीतकार पुरुषार्थ सिंह के सद्यः प्रकाशित खंडकाव्य ‘गीता के गीत’ का लोकार्पण हुआ।

डा. पांडेय ने कहा कि प्रसाद की रचनाओं पर बहुत लिखा गया है और आगे भी यह क्रम चलता रहेगा लेकिन उनके गुरु-गंभीर गहन व्यक्तित्व और साहित्य में अब तक लगभग अज्ञात जीवन-वृत्त को आख्यान में ढालना बहुत मुश्किल काम था, जिसे पहली बार श्यामल ने संभव बनाया। अध्यक्षीय संबोधन में काशी विद्यापीठ के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सुरेंद्र प्रताप ने कहा कि ”कंथा” अमृतलाल नागर के ‘मानस का हंस और गिरिराज किशोर के ‘पहला गिरमिटिया’ की तरह बड़े फलक का विशाल उपन्यास है। इसकी मीमांसा के लिए वृहत विमर्श-संगोष्ठी की आवश्यकता है। इसका शीघ्र ही आयोजन किया जाएगा। मंगलाचरण सार्थक पौराणिक ने किया। दिल्ली से आईं मुख्य अतिथि कवियत्री डा. अंजना सिंह सेंगर ने ”कंथा” जैसा बड़ा ग्रंथ रचने के लिए श्यामल को बधाई दी। कहा कि प्रसाद के जीवन पर रचे गए श्यामल के इस उपन्यास ने हिंदी साहित्य जगत में उस बनारस को लंबे समय बाद फिर से केंद्र में ला खड़ा किया है, जहां कभी उपन्यास-सम्राट प्रेमचंद रहा करते थे और अब कथा-शिखर डा.काशीनाथ सिंह की गरिमामयी उपस्थिति बनी हुई है। अंतर्नाद प्रमुख पुरुषार्थ सिंह ने कहा कि कंथा ने आधुनिक काशी के बीच पुरातन साहित्यिक वैभव और छायावाद न केवल जीवंत किया कथा साहित्य को असीम ऊँचाई प्रदान किया है।

राजघाट के निकट अवधूत भगवान रामघाट के पास रुके बजड़े में देररात तक चले दूसरे सत्र का आरंभ ‘गीता के गीत’ के लोकार्पण से हुआ। मुख्य वक्ता और अध्यक्ष ने अपनी टिप्पणियों में कृति का महाभारत और श्रीमद्भागवत गीता के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन करते हुए कहा कि कवि ने गूढ़ संदर्भों का सरल भाषा में नया काव्य-भाष्य किया है। ‘गीता के गीत’ ने भगवान श्रीकृष्ण के संदेशों को सर्वथा नया और सर्वग्राह्य रूप दे दिया है। शहर के अलावा आसपास के जनपदों से आए डा. एकता जलनिधि, मोहित लाम्बा, झरना मुखर्जी, सुषमा मिश्रा, विजय मिश्र बुद्धिहीन, अनुराधा सिंह, संतोष प्रीत, सूर्य प्रकाश मिश्र, धर्मप्रकाश मिश्र, आर्यपुत्र दीपक, सौमेंदुवर्धन मालवीय, रविकांत पांडेय, शरद श्रीवास्तव, कंचन सिंह परिहार, प्रसन्नवदन चतुर्वेदी सहित डेढ़ दर्जन उत्साही रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। संचालन आचार्य पुरंदर पौराणिक और धन्यवाद ज्ञापन कवि रुद्र प्रताप सिंह ने किया।

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