खूँटी
“तुम्हें और कोई तो काम ही नहीं है . जब देखो बैठ जाते कागज़ कलम लेकर या वो लेपटॉप लेकर …कौन से मुंशी प्रेम चंद हो तुम जो तुम्हारे खाली दोस्त इंतज़ार करते रहते हैं तुम्हारा . रोग पाल लिया है . अरे! ये दीवारों पर इन सजी हुई ट्राफियों और इन कागज़ के सम्मानों से कुछ नहीं होता .” वह गुस्से में बोले ही जा रही थी .
आज के सम्मान की शाल को हाथों में लिया और माथे से लगाकर अलमारी में रख दिया .
“अरे! इन शालों से क्या होगा ? आने-जाने का किराया भी इनसे ज्यादा होता है . घर में भी जरुरत होती है तुम्हारी . उसे देखो …वो तुम्हारा लाल ….छत पे चढ़कर पतंग उड़ा रहा था …अपना हाथ काट बैठा है . ट्यूशन की फीस भी देनी है . कोई पार्ट टाइम काम कर लो ताकि इन मुए गाने और लिखने वालों से पीछा छूटे.”
“भाग्यवान ! वो मेरे दोस्त हैं . पसन्द करते हैं मुझे . सम्मान करते हैं मेरा …प्यार करते हैं मुझे .”
“तो उनसे ये भी कहो कि घर का काम भी होता है , घर कहानियों, गीतों और ग़ज़लों से नहीं चलता है .”
“पापा ! मेरे प्रिंसिपल सर ने आपको बुलाया है . वो आपके फैन हैं . आपकी कहानी उन्होंने पत्रिका में पढ़ी थी . आप एक बार पी टी एम गये थे न तो उन्होंने पहचान लिया .” बेटे ने कहा .
“जरुर चलूँगा बेटे पर शनिवार को . काम से छुट्टी नहीं कर सकता न .”
” पापा ! आपकी एक चिट्ठी भी आई है . मैं अभी लाता हूँ . वहाँ फ्रीज पर रखी है .” और वह फ्रीज के ऊपर से एक चिट्ठी उठा लाया .
उसने चिट्ठी खोली और पत्र पढ़ने लगा .
“पापा ! इसके साथ कुछ और लगा हुआ है .”
“हां, बेटा . उन्होंने मेरी कहानी माँगी है . मेरी कहानी खूँटी उन्हें बहुत पसन्द आई थी और ये देखो तीन हजार रुपये का चेक भी भेजा है .”
“क्या ? तीन हजार का चेक ? दिखाओ तो सही मुझे .” पत्नी ने हाथ में पत्र लेते हुए कहा . चेक देखकर वह बहुत खुश हुई और बोली –
“खूँटी कहानी में क्या लिखा था ?”
“कुछ खास नहीं , बस यही लिखा था जो तुम सब मेरे साथ करते हो . मैं खूटी ही तो हूँ , दोस्तों के लिए नई कहानी की खूँटी, तुम्हारी मांगों की खूँटी और खुद के सपनों की खूँटी .”
“ये भी कोई कहानी हुई भला . ऐसा तो हर एक होता है . तुम खाना खा लो और आज अच्छी सी कहानी लिखो . फिर मुझे सुनाना .”
शब्द मसीहा


बहुत-बहुत आभार इस रचना को मान देने के लिए .