बीड़ी नहीं हूँ
“रफिकन बी ! कहाँ चलीं आप ?” तरन्नुम बोली .
“जाना कहाँ है , अगली बार फिर खुदा ने औरत बना दिया तो उससे पहले अपने लिए जरा हिफाजत का इंतजाम तो करती चलूँ मैं .”
“हा हा हा …बूढी घोडियों को काहे का खतरा जो हिफाजत की बात कर रही हैं आप ?”
“खतरा है बेटी ! ये जो खुदा ने बराबर का दर्जा दिया औरत और मर्द को , मर्द उस से खुश नहीं रह पाता . भंवर बना फिरता है . औरत का रस चूसा और दे दिया तलाक . औरत का हक और हुकूक मारा जा रहा है और उस पर भी मुक़द्दस किताबों का हवाला देकर . वो लौंडिया तीन तलाक का केस क्या लड़ रही है जनाब फतवे जारी कर रहे हैं .” रफिकन गुस्से से बोली .
“बात तो आप सही कह रही हैं पर हमें रहना तो मर्द के ही साथ है , उसके खिलाफ़ कैसे खड़े हो जायें हम ?”
“मर्द के खिलाफ़ नहीं , औरत के साथ …जो हमारे हक में है . अरे! औरत क्या इतनी कमजोर और लाचार है कि कोई भी उसकी चोटी काट ले , उसे लोग पत्थर से मार दें . क्यों नहीं फतवा दिया कभी कि तीन तलाक कहने वाले मर्द की मूछ काट दें एक तरफ की ? औरत को कमजोर समझते हैं नामाकूल …जाकर पूछूँगी उनसे …कितने में बेचते हो अपनी बेटी की चोटी . शर्म नहीं आई ऐसे फतवे देते हुए …औरत को क्या बीडी समझा हुआ है कि जब तलब लगी हवस का कश मार लिया और फेंक दिया फिर तीन तलाक के कूड़ेदान में सड़ने के लिए .”
“रुको बी , मैं भी आती हूँ .”
शब्द मसीहा


हार्दिक आभार इस रचना को स्थान देने के लिए
सर जी,
आपके रचना के आगे हम नतमस्तक हैं।