रचनाकार

डॉ. वसीमुद्दीन जमाली की नई ग़ज़ल “दोस्त”

मेरे एक दोस्त ने ये लिखा
मेरे साथ जितने भी यार हैं
वो सभी ही साठ के पार हैं

अब सभी के बाल हैं पक गए
कुछ कमर से अपनी लचक गए

नहीं पहले जैसी रफ़ाक़तें
न ही चेहरे पर हैं बशासतें
है ये लगता ,सब हैं थके हुए
हैं सब वक़्त के हाथ बिके हुए

लिखा मैं ने उस को कि, जाने मन
ये ग़लत, तुम्हारा ख़्याल है
जो है,दोस्तों के लिए लिखा
नहीं, दोस्तों का ये हाल है

थी जो भाग दौड़ की ज़िंदगी
न ही सब्र था,न,क़रार था
सभी अपने आप में क़ैद थे
हाँ,सभी को दौलत से प्यार था

इस मुक़ाबले की दौड़ में
थे सभी के जिस्म थके हुए
अगर ग़ौर से,उन,को देखते
थे सभी के चेहरे बुझे हुए

मगर आज ग़ौर से देख लो
अब सभी के रुख़ पर सुकून है
किसी दोस्त के काम आ सकें
यही सब के दिल में जुनून है

न है,कोई दोस्त थका हुआ
न ही कोई दोस्त बिका हुआ
हैं सभी के चेहरे खिले हुए
हैं सभी के दिल भी मिले हुए

सभी दोस्त रोशन-ख़्याल हैं
न गिला ,न कोई मलाल है
हैं सभी के दिल में मोहब्बतें
न कुदुरतें हैं, न नफ़रतें

यहां सब के चेहरे पे नूर है
मुझे दोस्तों पे ग़ुरूर है
है” जमाली” करता यही दुआ
करम रब का हम पे रहे सदा

शायर: डॉक्टर वसीमुद्दीन जमाली, मऊ में सीनियर कंसल्टेंट सर्जन हैं…

रफ़ाक़तें:साथ रहना ,बशासतें:ताज़गी
रोशन-ख़याल: खुले विचार वाला
कुदुरतें:दिल मे बुरे भाव रखना

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *