अपराधी तो अपराधी है, उसकी कोई जाति नहीं …
( देव कान्त पाण्डेय )
वे हमसे बोले पंडित हो,पढ़े-लिखे भी दिखते हो,
फिर ‘उस पंडित’ के बारे में, अच्छा क्यों ना लिखते हो ?
अपने कुल का दीपक था, वह सब का बहुत चहेता था,
शेर सरीखा था ‘वह पंडित’, जाति का अपने नेता था ।
मैंने बोला बात सुनो, क्या बुद्धि से बिल्कुल लंगड़े हो ?
सोच तुम्हारी कितनी पिछड़ी, कहने को तुम अगड़े हो ।
ना जाने किस विद्यालय में तुमने बुद्धि खपाई है,
बुद्धि तुम्हारे जैसी ही क्या हर ब्राह्मण ने पाई है ?
पता नहीं अपने अतीत का, गौरव का कुछ ज्ञान नहीं,
जग पूजित अपने पुरखों का मन में कुछ सम्मान नहीं ।
आज एक दुर्दांत माफिया को अगुआ बतलाते हो,
मौत पे उस जालिम गुंडे के झूठे अश्रु बहाते हो ।
क्या तुमको उन आठ शहीदों की कोई परवाह नहीं ?
उनके मात-पिता, बच्चों की पीड़ा का कुछ थाह नहीं ?
मुझे तो उन उजड़ी मांगों का सूनापन खल जाता है,
इक माँ की आंखों से बहता, आंसू मुझे रुलाता है ।
उन निरीह बच्चों की चीखें, अंदर तक चुभ जाती हैं,
दुःखी पिता की सूनी आंखें, प्राण मेरे तड़पाती हैं ।
तुम उस हत्यारे का मरना, हजम नहीं कर पाते हो,
जाति-धर्म का चश्मा पहने, जो मर्जी बतियाते हो ।
‘मिश्रा जी’ हैं उसी जाति के, उसने कब ये देखा था ?
निर्ममता से मार उन्हें, घर के आँगन में फेंका था।
कितने स्वजातीय खूनों से, हाथ थे उसके रंगे हुए,
न्यायालय की देहरी से भी लौटे थे सब ठगे हुए ।
अपराधी तो अपराधी है, उसकी कोई जात नहीं,
यदि मन का विस्तार करो, तो उसकी कुछ औकात नहीं ।
वह अपने हित-साधन को, तुमको यूं ही बहकाता है,
उसके यदि विपरीत गए, फिर तुमको भी निपटाता है ।
अतः लोकहित में ऐसे लोगों का ना सहयोग करो,
तुम वंशज हो चाणक्य के, मेधा का उपयोग करो ।।


