पिता साइकिल से फेरी लगाकर कपड़ा बेचते हैं, बेटा 45वीं रैंक लाकर बना IAS

( आनन्द कुमार )
बिहार। जिन्दगी गरीबी में जूझ रही हो, परिवार का लालन व पोषण व शिक्षा देने के लिए पिता गली-गली व गांव-गांव साइकिल से घुम कर कपड़ा बेचता हो और बेटे ने सिविल सेवा परीक्षा 2020 की परिणाम में 45 वीं रैंक लाकर अगर आईएएस बन जाए तो फिर क्या कहना। ऐसे होनहार बेटे पर किसे फक्र नहीं होगा कौन खुशी से झूम नहीं उठेगा। जी हम बात कर रहे हैं बिहार के किशनगंज जनपद के नेपालगढ़ कालोनी निवासी संजय बोसाक के पुत्र अनिल बोसाक की। जिस पुत्र का बचपन बेहद गरीबी में बीत रहा हो और उसके आंखों के सामने उसका पिता गली-गली में घूमकर कपड़ा बेचता हो तो उसके बेटे का बड़ा सपना देखना लाजिमी है। उसे मन में लक्ष्य संजोना ही पड़ेगा वह भी तब जब मां-बाप ऐसे बच्चों में गरीबी के अभाव को तो नहीं रोक सके लेकिन संस्कार की अमीरी इतनी दिया हो कि धन दौलत वाले उसके सामने टीक ना सके।

परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के बावजूद भी संजय बोसाक ने अपने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी महसूस नहीं होने दी,और बेटे अनिल बोसाक ने अभाव में जिन्दगी जीने के साथ पढ़ाई व तैयारी कर वह तोहफा दिया जो सिर्फ संजय बोसाक के परिवार के लिए नहीं पूरे किशनगंज, बिहार व देश के हर नागरिक के लिए एक सीख है कि मंजिल हो, इरादा हो, सपने हो तो कोई भी मुकाम पाना मुश्किल नहीं है। अनिल बोसाक कहते हैं कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता लेकिन पिता की मेहनत को देखकर वे ऐसा सोचते थे कि एक दिन इतना बड़ा अधिकारी बनूं कि मां बाप को आराम का मौका मिल सके। अनिल बोसाक के चार भाई हैं और वे दूसरे नंबर पर है।
इसके पहले भी अनिल यूपीएससी की परीक्षा में 616वीं रैंक लाकर वह इनकम टैक्स कमिश्नर बने लेकिन मन में आईएएस बनने का जुनून था, इसलिए वे इस परिणाम से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस रैंक को भेदते हुए दूसरी सफलता में 45वां रैंक लाकर यह सिद्ध कर दिया, मन से लगो तो मंजिल तो मिलेगी ही मिलेगी। अनिल ने किशनगंज शहर के ओरिएंटल पब्लिक स्कूल से 8वीं, वर्ष 2011 में अररिया पब्लिक स्कूल से मैट्रिक, बाल मंदिर सीनियर सेकेंडरी स्कूल किशनगंज से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। 2018 में आईआईटी दिल्ली से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर परिवार के पहले ग्रेजुएट बने।

