सपा-बसपा में नहीं बनी बात तो किसकी खुलेगी भाग्य!
@आनन्द कुमार…
० यूपी में एक विधायक वाली बसपा से लोकसभा के अधिकतर सीटों पर भाजपा, सपा, कांग्रेस, रालोद, सुभासपा, निषाद पार्टी सभी को डर है!
सबके अपने-अपने ताक़त हैं, सबके अपने-अपने दांव हैं, कोई विश्व की सबसे बड़ी पार्टी अपने को कहता है, तो कोई यूपी की राजनीति में अपने आपको बहुत ताकतवर मानता है। 2024 लोकसभा सामान्य निर्वाचन की डुगडुगी बज चुकी है। सब अपने-अपने जीत का दंभ भर रहे हैं, बहुत से गठबंधन कर जीत के तरीक़े ढूँढ रहे, तो बहुतेरे प्रत्याशियों की घोषणा कर चुके हैं! ऐसे में बसपा सुप्रीमो मायावती सिर्फ़ और सिर्फ़ एकला चलो की तर्ज़ पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर रही हैं, तो बहुतेरे की नज़र मायावती के फ़ैसले पर है कि वह पता नहीं राजनीति में कब कौन सी नई चाल चल दें कि औरों के चाल बिगड़ जाए, इसलिए लोगों की धुकधुकी भी बनी हुई है । आइए बात करते हैं उत्तर प्रदेश की सियासत में बसपा की चुप्पी चाल पर!
2019 में 10 सांसदों वाली बसपा के कई सांसदों ने छोड़ी हाथी की सवारी…
ऐसे में यूपी की सियासत में 2019 की लोकसभा में सपा से गठबंधन के बाद भी बसपा को महज़ 10 सांसदों पर ही संतोष करना पड़ा था। लेकिन 2024 का इलेक्शन आते-आते बसपा के कई सांसद हाथी की सवारी से उतर या तो भाजपा से गठबंधन कर चुके हैं या फिर साइकिल की सवारी कर रहे है, या तो कुछ भाजपा से टिकट की उम्मीद में बसपा छोड़े और बीजेपी ने टिकट दूसरे को देते हुए उन्हें वेटिंग का रास्ता दिखा दिया है। ऐसे में गाजीपुर से बसपा के सिम्बल पर सांसद बने अफजाल अंसारी 2024 में सपा के इस सीट पर उम्मीदवार हैं, तो अम्बेडकर नगर के सांसद रितेश पांडेय कमल के फूल से प्रभावित होकर बसपा को बाय-बाय कर चुके हैं। वहीं लालगंज की सांसद संगीता आज़ाद ने बसपा से दूरी बनाकर भाजपा का दामन थामा तो ज़रूर है, लेकिन भाजपा ने ज़ोर का झटका देते हुए पूर्व प्रत्याशी नीलम सोनकर को ही अपना उम्मीदवार बता दिया। ऐसे में दस सांसदों की संख्या भले ही कम हो गई हो लेकिन बसपा अपने आपको कहीं से कमजोर मानने को क़तई तैयार नहीं है!
यूपी में महज़ एक विधायक वाली बसपा से भाजपा, सपा, कांग्रेस व सुभासपा सभी को डर…
2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में, बलिया जनपद के रसड़ा विधानसभा से बहुजन समाज पार्टी के विधायक उमाशंकर सिंह ही मात्र जीत सके, और वे इकलौते विधायक बन विधानसभा में अपने क्षेत्र व बसपा का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक सीट पर बसपा के सिमटने पर भले ही विरोधी, मीडिया व सोशल मीडिया पर तरह-तरह के कमेंट और पोस्ट करके बसपा का मज़ाक़ उड़ाये हों, लेकिन बसपा यूपी से ख़त्म हो गई, यह यूपी की राजनीति का समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति स्वीकार नहीं कर सकता। तभी तो यूपी में एक विधायक वाली बसपा से लोकसभा के अधिकतर सीटों पर भाजपा, सपा, कांग्रेस, रालोद, सुभासपा, निषाद पार्टी सभी को डर है ।
इस दल के लोग भले ही बोल नहीं रहे हैं लेकिन बसपा जब तक अपनी तस्वीर क्लीयर न कर दे, उनके लोकसभा के प्रत्याशियों पर जीत को लेकर धुकधुकी बनी रहेगी ।
कहीं गठबंधन न हो जाए !
भाजपा 2024 का क़िला आसानी से फ़तह करने के लिए वर्तमान के परिदृश्य की बदौलत भले ही अपनी हर बिसात बिछा ली हो लेकिन उसे कहीं न कहीं, यह डर तो सता ही रहा है, कि कहीं बसपा सुप्रीमो पुन: सपा से मिलकर I.N.D.I.A. गठबंधन का हिस्सा न बन जाए! अगर ऐसा होता है तो, जो परिणाम 2019 में आया था उस जैसा ही परिणाम होगा, यह सोचना ग़लत साबित हो सकता है। क्योंकि भले ही आचार संहिता लग गया है, अगर बसपा कोई गंभीर चाल चली तो बिछी बिछाई बिसात पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे और इसकी चपेट कौन आएगा यह आसानी से सोचा जा सकता है ।
वैसे बात अंदरखाने की करें तो सपा, बसपा व कांग्रेस के पदाधिकारी व कार्यकर्ता यही चाहते हैं कि एक बार उनके नेताओं को पुनः साथ-साथ आकर भाजपा व मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहिए! ऐसे कुछ को यही डर है कि कहीं गठबंधन न हो जाए !
यूपी में गठबंधन हुआ तो, बदलेगी अन्य राज्यों की तस्वीर…
सपा-बसपा में अगर गठबंधन हुआ तो उत्तर प्रदेश में राजनीति की तस्वीर तो बदलेगी ही साथ ही साथ अन्य प्रांतों में जहां बसपा का कोई विशेष महत्व भले ही नहीं है, लेकिन राजद व इ.ण्डि.या. गठबंधन को लेकर ग़ैर राजद के गठबंधन दल के नेताओं व प्रत्याशियों को बल मिलेगा, ऐसे में बसपा के गठबंधन में शामिल होने के बाद, अन्य राज्यों की तस्वीर भी बदल सकती है!
सपा-बसपा में नहीं बनी बात तो किसकी खुलेगी भाग्य…
2024 के लोकसभा चुनाव में अगर सपा-बसपा का गठबंधन नहीं होता है तो, सबसे ज़्यादा ख़ुशी भाजपा खेमें में होगी, क्योंकि बसपा के अकेले चुनाव लड़ने से सबसे ज़्यादा फ़ायदा उसे ही होने वाला है। ऐसे में बसपा नुक़सान में तो रहेगी ही, 2027 तक के यूपी की सियासत से वे काफ़ी दूर जा सकती हैं! ऐसे में वोटर व सपोर्टर दोनों के खिसकने का डर बना रहेगा! ऐसे में बसपा को 2024 के लोकसभा चुनाव की गम्भीरता को समझते हुए कुछ अलग करना होगा, नहीं तो उसके क़िस्मत की भाग्य किसी और के क़िस्मत में जा सकती है!

