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नोबेल विजेता दिमित्री मुरातोफ़ की अद्भुत पहल

@ डॉ. कन्हैया त्रिपाठी…

नोबेल पुरस्कार विजेता दिमित्री मुरातोफ़ का नाम सुना होगा आपने, हो सकता है उनको भूल भी गए होंगे. लेकिन दुनिया के जो लोग दिमित्री को भूल गए हों, उन्हें पुनः उनके नाम को जान लेने और उनको हृदय में बैठा लेने की कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने अपने नोबेल पदक की नीलामी करा दी और उससे जो राशि मिली है उसको युक्रेन में युद्ध से प्रभावित लोगों खासकर बच्चों की सुरक्षा और उनकी गरिमा की रक्षा के लिए दे दिया. पुनरुज्जीवन के लिए दान दे दिया. यह धन उन्होंने संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनिसेफ को दी है. राज्यों के बीच चल रही जंग और एक व्यक्ति की यह सेवाभावी और जनहितकारी मुहिम की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही लगती है.

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

हम जानते हैं कि युक्रेन में अब तक बड़े पैमाने पर जन-धन एवं सामरिक महत्त्व की चीजों का नुकसान हुआ है. लम्बे समय से वहां युद्ध चल रहा है. वहां यह केवल नुकसान नहीं है अपितु मेरी दृष्टि में यह राज्यों की एक युद्धक और विभत्स होती मानसिकता का ज्वलंत प्रमाण है. युक्रेन नष्ट हो जाए तो भी जो हानियों के बदले मिलेगा उसका क्या फायदा कोई राज्य उठा सकेगा, यह सोचने वाली बात है. जो भी देश इस युद्ध को लड़ रहे हैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, उन्हें अंततः कुछ मिलने वाला नहीं है.

दुनिया में जंग की जो भी बारीकियां हैं उसके समझदार विद्वत लोग यह मानते हैं कि युद्ध का परिणाम शांति नहीं होता. पतन, निराशा और घोर अंधकार अवश्य होता है. यह विडंबना ही है कि दुनिया फिर भी युद्ध लड़ती रही है और बर्चस्व की इस लड़ाई में मानवता पिसती रही है. कॉर्पोरेट लोगों के बीच से भी ऐसे करुणा और सहयोग की मुहिम आनी चाहिए लेकिन वहां से कोई इस प्रकार की बड़ी पहल नहीं की जा रही है. युद्ध से आज जो फायदे हैं उसके लिए अपने-अपने फायदे के अनुसार युद्ध के हथियार और दूसरे आवश्यक संसाधन कॉर्पोरेट के लोग तैयार करते हैं. उनके केवल कार्य ऐसे हथियारों का उत्पादन और व्यापर नहीं होना चाहिए बल्कि उन्हें इस उत्पादन से जन-धन की हानि के बारे में भी विचार करना चाहिए.

बहुत से देशों के बजट के अधिकांश हिस्से केवल युद्ध के हथियार खरीदने में चले जाते हैं. क्या कभी इस पर विचार करना आवश्यक नहीं है कि यह तो मनुष्यता के खिलाफ पारित होने वाले बजट हैं. बर्चस्व की राजनीति ने जिन देशों के ऐसे बजट को पेश व पारित मजबूर किया है वह एक उनकी घिनौनी कृत्य है. इस पर मंथन के लिए संयुक्त राष्ट्र को कम से कम अवश्य पहल करनी चाहिए कि केवल युद्ध और युद्धक हथियार पर इतने बड़े धन की खपत खरीद-फरोख्त में हो रही है, यह क्या हो रहा है. कोई भी राष्ट्र इस बर्चस्व की राजनीति से महान नहीं बन सकता. कोई भी राष्ट्र इससे अपने खून से सने पंजे के साथ किसी भी दशा में विश्वव्यापी सभा में बैठने, अपने अमानवीय चेहरे दिखाने व वक्तव्य को जारी करने का अधिकारी नहीं है. युद्धरत राज्यों की देखा जाये तो अपनी-अपनी चुनौतियाँ हैं जिसके कारण वे युद्ध में संलग्न हैं लेकिन उन आम लोगों का क्या जो इस युद्ध के लिए जिम्मेदार नहीं हैं.

जहाँ यह सब हो रहा है वहां इस प्रकार की संवेदना दिमित्री द्वारा प्रकट करना और केवल उसे घोषित करने तक सीमित न रखकर अपने पुरस्कार में मिले सामग्रियों को नीलामी करके मानवता के लिए उसे दे देना, निःसंदेह एक बड़ा सन्देश है दुनिया के लिए. नोबेल पदक की नीलामी से 10.35 करोड़ डॉलर दान करने के लिए दिमित्री की दुनिया भर में प्रशंसा हो रही है.

प्रशंसा इस बात की भी हो रही है कि दिमित्री साहब यह नीलामी करते वक्त इस बात को सुनिश्चित किए कि जो हमारे नोबेल पदक को इतनी बड़ी राशि चुकाकर अपने पास रखना चाहता है, उसकी पृष्ठभूमि क्या है? उन्होंने उसकी जांच-पड़ताल की कि कहीं नीलामी के लिए कीमत लगाने वाले के पास धन किसी बुरे कर्म या मध्यम से नहीं आ रहा है? दिमित्री के मंसूबे साफ हैं और और वह उसी पवित्र हृदय से इस खोज में लगे थे कि जिन्हें मैं नीलाम कर रहा हूँ उनके पैसे कमाने का स्रोत क्या है. कहीं उनके पैसे ड्रग्स तस्करी, अपराधिक पृष्ठभूमि या दमनात्मक तरीके से तो कमाकर हमारे पदक के लिए नहीं लगाया जा रहा है. उनका यह मानना रहा है कि बुरे कार्य में संलग्न लोग हमारे सम्मान को अधिगृहीत न करें और यदि हम इसे नीलाम करके यूनिसेफ को दें तो वह पुनीत भाव से उन लोगों के भीतर मानवीय संवेदना को भर दे. उन्होंने यूनिसेफ को इसीलिए चुना क्योंकि उन्होंने यह भी पड़ताल की कि कौन सा संगठन वास्तव में मानवता के लिए समर्पित होकर कार्य कर रहा है. इस प्रकार दिमित्री जो कि पवित्र हृदय के साथ अपने मूल्यों के लिए जाने जाते हैं, की तारीफें हो रही हैं. वह जाने-माने स्वतंत्र रूसी संचार सेवा-नोवाया गज़ेटा के प्रधान संपादक की हैसियत से नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले एक नायब इन्सान हैं.

दिमित्री मुरातोफ़ के इस फैसले से शरणार्थी बच्चों को लाभ मिलेगा जो युक्रेन के सीमावर्ती क्षेत्रों में शरणार्थी जीवन जी रहे हैं और रूस में रह रहे 15 लाख शरणार्थी बच्चे भी इसका लाभ पाएंगे. किसी रूसी पत्रकार की सेवा की और उसके भीतर पीड़ा की समझ की यह कहानी है. यह 21वीं सदी के इस पड़ाव की महान घटना है जिसने अपने होने का एहसास उन शरणार्थी बच्चों के भविष्य के साथ जोड़कर अभिव्यक्त किया है. मनुष्यता के लिए किसी पत्रकार की उद्दातता और बड़ी सोच है जो दिमित्री मुरातोफ़ ने दुनिया के सामने रखी है. फिलीपींस की पत्रकार मरिया रेसा के साथ 2021 में उन्हें उनके श्रेष्ठ निर्भीक पत्रकारीय अवदान के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला था.  

सबसे ज्यादा वे ही सुखी रहते हैं जो जीने का अर्थ जानते हैं. दिमित्री मुरातोफ़ ने अपने होने को इसी तराजू पर रखकर हमेशा देखा और उन्हें इसके परिणाम स्वरूप दुनिया भर में प्रतिष्ठा भी मिली. यह और महत्त्वपूर्ण बात है कि वह रूस के हैं और युद्ध रूस और युक्रेन लड़ रहे हैं. प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसमें दोनों देशों के लोग प्रभावित हुए हैं. हानि दोनों कि हुई और जिन देशों ने इसमें परोक्ष रूप से दोनों देशों को लड़ाने में सफलता पाई वे भी इससे बहुत कुछ हासिल नहीं कर पाए हैं और न पाएंगे. रूस तो कदापि किसी फायदे में नहीं है. यह बात अलग है कि युद्ध दोनों देश लम्बे समय से लड़े जा रहे हैं और इसके नुकसान से भी उनमें कोई चिंता नहीं झलकती. इन विरोधाभाषी समय में दिमित्री मुरातोफ़ ने अपने दिल की सुनी और दुनिया में जो कर दिया उसके लिए वह प्राकृतिक रूप से विश्व में अमरत्व को हासिल कर चुके हैं. उन्होंने बच्चों के लिए, मानवता के लिए, शरणार्थी चुनौतियों की सामना कर रहे लोगों के लिए करुणाभाव से अपना सर्वस्व एक झटके में लुटा दिया जो उन्हें दुनिया ने सम्मान से दिया था.

हिंसक युग में करुणा और सेवा के लिए, उनके श्रेष्ठ निर्भीक व साहसिक कदम के लिए आदर के भाव स्वतः उत्पन्न होने चाहिए. वे लोग जो युद्ध से अपनी कमाई कर रहे हैं उन्हें अपने भीतर झांककर देखना चाहिए कि उनका भी कुछ आत्म बचा है कि नहीं? युद्ध तो एक पल के लिए ‘विजय के भविष्य’ लेकर चलते हैं, लेकिन तब तक बहुत कुछ उस युद्ध से खो चुका होता है. उन लोगों को भी अपने भीतर करुणा को खोजने की आवश्यकता है. अच्छा हो, संसार में युद्ध ही न हों लेकिन जिन परिस्थितियों में युद्ध हमारे समक्ष आते हैं उन पर काबू करना आवश्यक है. आवश्यक यह है कि ऐसे संघर्षशील क्षेत्रों में रह रहे लोगों के प्रति विनम्र सेवाभाव पहुँचें, जैसा दिमित्री मुरातोफ़ ने किया है.

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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्त्व निभा चुके हैं और अहिंसक सभ्यता के पैरोकार हैं

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