दूध का क़र्ज़
“अरे! तू क्या बाबला है. कैसे उस करमजली ने अपना मुँह जलवा लिया तेज़ाब से और तू उसे प्यार करता है . तू मेरा दूध लजाएगा क्या?”
“माँ ! तुम ये क्यों भूल रही हो कि तुम भी एक औरत हो . अगर प्रभा ने गलत किया होता तो उसका चेहरा जला हुआ नहीं होता . ये जला हुआ चेहरा ही उसकी सच्चाई का सबूत है. उसे मेरे सिवाय कोई और पसंद नहीं था . अगर ऐसे में मैं उसके पास नहीं जाता हूँ तो वह टूट जायेगी …उसका मुहब्बत से विश्वास उठ जाएगा.”
“मगर हम समाज में क्या मुँह दिखाएँगे ? लोगों को क्या जवाब देंगे ?”
“अगर यही हादसा उसके साथ शादी के बाद होता तो क्या करती माँ ? जरा सोचो अगर मेरी बहिन के साथ ऐसा होता तो हम क्या चाहते ? ये चमड़ी का प्यार नहीं है माँ इसे खूबसूरती से मत तोलो . मैंने उसे सच में प्यार किया है .”
“अगर तेरा मन उसे देख फिर गया तो क्या करेगा . तू उस पे रहम खा रहा है फिर बाद में पछतायेगा . सोच ले सौ बार कोई कदम उठाने से पहले .”
“तेरा बेटा हूँ माँ …प्यार किया है तो दूध की लाज बचाना भी जानता हूँ . मेरी ज़िन्दगी शक्ल से कितनी भी कम खूबसूरत हो पर दिल और सीरत से कोई भी उस से ज्यादा सुन्दर नहीं .”
“तो जाओ बेटा ! ये माँ आज अपने दूध का क़र्ज़ माफ़ करती है तुम्हारी मुहब्बत पे वार के .”
शब्द मसीहा

