खास-मेहमान

ट्रेन वाली लड़की

दिल्ली रेलवे स्टेशन से पूजा एक्सप्रेस पकड़कर माँ वैष्णों देवी की यात्रा के लिए हम सब लोग जा रहे थे . ट्रेन आधा घंटा लेट थी . तभी मेरी निगाह एक लड़की पर गई वो बहुत ही परेशान सी लग रही थी . मगर साहब ये दिल्ली शहर है , यहाँ कौन परेशान नहीं है . हम लोग आपस में बातें करते रहे . मगर इस बीच उस चेहरे पर मेरी लगातार नजर बनी हुई थी .

जैसे ही ट्रेन लगी .हम सब अपनी सीट की तरफ चल दिए . मगर यहाँ तो एक और सरप्राइज सामने था . हमारा सीट नंबर उन्नीस से बाईस था और उनका तेईस नंबर था . वह अब भी गुमसुम ही बैठी हुई थी . मुझसे रुका नहीं जा रहा था .

“माफ़ कीजिये , आपको कोई परेशानी तो नहीं .”

“सर! परेशानी है मगर आप मेरी मदद नहीं कर सकते .”

“क्या हुआ है ? कुछ बताएं तो बात बने .”

“मैं यहाँ उतर रही थी ऑटो से किसी ने मेरा पर्स साफ़ कर दिया . पैसे और टिकिट दोनों चले गए . अब पता नहीं टी टी ई मुझे सफ़र करने देगा या नहीं .”

“ओह ! टिकिट कौन-सा था ? क्या ई टिकिट है ?”

“हाँ, लेकिन मोबाइल भी चला गया मेरा , उसमें मैंने सेव कर रखा था और आई डी भी .” वह बोली .

“कोई बात नहीं . आपको किसी का नंबर याद है घर में जो आपको मेल या व्हाट्सअप कर सके .”

“हाँ, मेरी एक दोस्त के साथ मैंने अपना ई-मेल शेयर किया हुआ है .शायद वह मदद कर सके .”

“ओ के . आप उनका नंबर लगाइए और आई डी प्रूफ भेजने को कहिये मेरे नंबर पर . लीजिये मेरा फोन लीजिये .”

उसने फ़ोन लेकर किसी लड़की को फोन लगाया . “प्रेरणा ! मेरे पर्स से मेरा मोबाइल और टिकिट के साथ सब चोरी हो गया . तुम मेरा आई डी इस नंबर पर व्हाट्स अप कर दो”

“सर ! आप के मोबाइल पर पे टी एम् है क्या ?” उसने पूछा .

“नहीं , वो कोई जरुरी भी नहीं . आप अपनी यात्रा का इंतजाम कीजिये बस .”

उसने फोन मुझे वापिस कर दिया . पत्नी लगातार मुझे घूरे जा रहीं थीं .
कुछ देर बाद फोन में मेसेज का इंडिकेशन आया . मैंने देखा तो आई डी था . इशरत जहां नाम था उसका .

“इशरत ! आपका आई डी आ गया है . अब आप सफ़र कर सकेंगी . चिंता मत कीजिये . आपने खाना खाया कि नहीं ?”

“सर! वो मुझे यहीं से लेना था मगर सब चला गया पर्स से .” वह बोली .

“सुनो जी ! कुछ खाने को दो और पानी भी .” मैंने पत्नी से कहा .

उसने मेरे माथे की तरफ देखा . मेरे माथे पर चन्दन का टीका था. वह बोली-

“सर! आपको तकलीफ होगी . आपके साथ बच्चे भी हैं .”

“अरे! नहीं , हमारे पास बहुत खाना है . कोई चिंता की बात नहीं है .” तब तक पत्नी ने एक प्लेट में पाँच पूरियां , भिन्डी की सब्जी और अचार आगे बढ़ा दिया था . बेटे ने पानी की एक बोतल भी उसे दे दी .

“लो , आप खाना शुरू करो , हम लोग भी खाते हैं .” उसने दुपट्टा सिर पे किया और ईश्वर का धन्यवाद करते हुए खाना शुरू किया . हम लोग भी खाना खाने लगे .

गाडी चलने पर टी टी ई साहब आ गए . हमने अपनी टिकिट चेक करवाएँ और उस लड़की के साथ हुई दुर्घटना भी बता दी . मोबाइल से आई डी प्रूफ भी .

“सर! ऐसे चलता तो नहीं है पर …”

‘मैं रेलवे से ही हूँ . हेड ऑफिस में . लड़की झूठ नहीं बोल रही है .”

“सर! रास्ते में कोई तकलीफ न हो आप सम्हाल लीजिएगा तब .”

“आप के साथ हूँ . अम्बाला की टीम मुझे जानती है . अगर आये तो मैं उन्हें बता दूंगा .” वह आगे बढ़ गया .

“सर ! बहुत -बहुत शुक्रिया . जम्मू पहुँच के किसी को बुला लूंगी घर से .”

“कहाँ है घर ?”

“जम्मू से पांच घंटे का रास्ता है . भाई या अब्बू आ जायेंगे .”

“कितने पैसे लगते हैं ?”

“नहीं सर ! इतना ही बहुत है . मैं मैनेज कर लूंगी .” वह बोली .

“ये लो पांच सौ . काम चल जाएगा न तुम्हारा !” मैंने पैसे देते हुए पूछा .

“सर ! मैं आपको वापिस भेज दूँगी . आपका कार्ड दे दीजिये .”

“हा हा हा …मैं इतना बड़ा आदमी नहीं हूँ कि कार्ड की जरुरत हो . हाँ, मेरा नंबर लिख लो कहीं और घर पहुँच के मुझे फोन कर देना .”

बात भी हुई थी और पता भी बताया था . हम लोग भी इस घटना को भूल चुके थे . मैं ऑफिस से घर पहुंचा तो डाक में दो तीन किताबें और एक चिट्ठी थी . उसमें शायद कुछ रखा भी हुआ था . मैंने चिट्ठी खोली तो एक राखी थी , एक चेक था और चिट्टी . मैंने पढ़ना शुरू किया –

“भाई जान ! आदाब .

उस दिन एक बच्ची की तरह आपने मेरी देखभाल की और मुझे हिम्मत दी . ख़ुदा ने आपको बहुत अच्छा दिल बख्शा है . मेरे पास आपका शुक्रिया अदा करने के लिए अलफ़ाज़ नहीं हैं . जिस तरह से आज लोग मजहब देखते हैं और बात करते हैं , उस सबके बीच आप से मिलना मेरे लिए बहुत पुरसकून रहा . एक रिश्ता आपने बनाया था और एक रिश्ता मैं बना रही हूँ आपसे . चिट्ठी के साथ एक राखी आपको भेज रही हूँ . उम्मीद है आप कबूल फरमाएंगे . यहाँ से मिठाई भेजना मुमकिन नहीं था इसलिए छोटी सी गुस्ताखी की है . आप मिठाई खरीदकर मुंह जरुर मीठा कीजियेगा .

आपकी अनजान बहिन
इशरत जहां”

मैंने पत्र अपनी पत्नी को दिखाया तो वह खुश हुई और उसे भी अनजान लोगों में मौजूद इंसानियत पर भरोसा हो गया . बहुत अनमोल राखी मिली थी ट्रेन वाली लड़की से …जो अब बहिन बन गई थी .

शब्द मसीहा

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