उत्तर प्रदेश

घोसी : राजभर का बचेगा या जायेगा ताज़

संजय दुबे (वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार )
0 ओमप्रकाश क्यों कर रहें अपनी जीत का दावा
o राजीव राय का क्या है जीत का गणित
लोकसभा की हर सीट पर इस समय जबरदस्त लड़ाई है।एनडीए हो या इंडी गठबंधन। सबको, जीत की दरकार है।ख़ास कर उत्तर प्रदेश में। दोनों में कांटे की टक्कर दिखती नज़र आ रही है।क्योंकि बीजेपी ने यहां 80 में 80 का लक्ष्य तय किया है।ऐसी ही एक चर्चित सीट है 70-घोसी लोकसभा। जहाँ चुनाव आखिरी चरण,1 जून को होंगे।ये सीट पहले आम चुनाव से लगाये कल्पनाथ राय के प्रतिनिधित्व तक, अपनी वैचारिक राजनीति वाली छवि संजोये रही।साम्यवादी, समाजवादी, विकासवादी राजनैतिक मॉडल विचारधारा यहां के चुनावों में केंद्रीय भूमिका में रही। बसपा, सपा के जातिवादी राजनैतिक उभार के बाद विचार धारा की जगह नेपथ्य में चली गयी। जातिगत गोलबंदी के चलते विचार से ज्यादा जातिगत वोटरों की संख्या मायने ऱखने लगी।

                           संजय दुबे

बसपा ने जहाँ इस चुनाव में अपने को इंडी गठबंधन से दूर रख  उसको कमजोर कर भाजपा को काफ़ी राहत दे दी है। साफ़ दिख रहा है कि बसपा का अलग से लड़ना, बीजेपी को फायदा पंहुचा सकता है। ये , राजनैतिक खेल बना बिगाड़ सकती है। पर,ज़्यादातर बिगाड़ेगी ही । ख़ास कर इंडी गठबंधन को ज्यादा नुकसान देगी । इंडी गठबंधन के लिए बसपा, बीजेपी से कमजोर प्रतिद्वन्दी नहीं है। कहीं – कहीं तो वो सीधे तौर पर उसको हराने का माद्दा रखती है ।ऐसी ही एक जोरदार लड़ाई अबकी घोसी लोकसभा सीट पर देखी जा रही है। इस सीट पर जहाँ सपा ने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव राय को मैदान में उतारा है वहीं बीजेपी ने ये सीट एनडीए के सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को दे दी है। इस सीट पर पार्टी के संस्थापक ओमप्रकाश राजभर (कैबिनेट मंत्री उप्र सरकार ) के पुत्र डॉ अरविन्द राजभर प्रत्याशी है। यहां चुनावी गंभीरता की जगह व्यक्तिगत खुन्नस ही वोटरों को देखने सुनने को मिल रही है।
अब तक हुए 17 आम चुनावों में बीजेपी ने हरिनारायण राजभर के जरिये इस सीट को एक बार जीता है। 2014 के लोकसभा चुनाव और मोदी लहर में। 2019 में बीजेपी से सांसद रहें हरिनारायण राजभर बसपा के अतुल कुमार राय से 122568 वोटों से हार गये। ये सयोंग नहीं था, जातिगत वोटों का खेला था। इस चुनाव में बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से 71465 वोट ज़्यादा पाकर भी अपनी सीट खो दी। गौर करने लायक़ बात ये है कि बसपा ने चुनाव में कुल पड़े वोटों में से 50.27 फ़ीसद वोट हासिल किए और बीजेपी ने 39.53 फ़ीसद वोट पाए। हार का अंतर 10.74 फ़ीसद का रहा।
अब, यहीं से शुरू होता है मंत्री ओपी राजभर के जीत का दावा वाला गणित शास्त्र। अपने बड़बोलेपन के लिए काफ़ी सुर्खियां बटोरने वाले राजभर यहां भी छाए हुए है। चर्चा, पर्चा, खर्चा भले बीजेपी का जीतने वाला फार्मूला रहा है पर, ओपी राजभर इसे बेहतर इस्तेमाल करते है। जिसके साथ रहते है उसके लिए भी और विपक्षी दलों के लिए तो वो, है ही।अक़्सर वो अपनी चुनावी मीटिंग में कह रहें है कि 2.50 लाख वोट से डॉ अरविन्द राजभर चुनाव जीत गये है। उनका मानना है कि 2019 में सपा, बसपा एक साथ लड़े तब अतुल राय 122568 वोट से जीते। वहीं 2014में ज़ब ये दोनों दल अलग – अलग लड़े तब बीजेपी 146015 वोट से चुनाव जीत गयी थी। इसलिए सुभासपा की छड़ी पर्चा भरने के साथ ही चुनाव जीत गयी है। ज़बकि इंडी गठबंधन झूठई दम्भ भर रहा है कि वो, जीत रहें है। एनडीए हार रहा है। ये तो रहा ओपी राजभर का चुनावी गणित।
अब आइये एक नज़र इंडी गठबंधन की चुनावी गणित पर डालते है। इस सीट पर सिर्फ़ मुस्लिम और यादव वोट मिला कर ही 6 लाख के आस पास है।जो सपा का सॉलिड वोट बैंक है। इसके इतर अभी अन्य पिछड़ी जातियों कुर्मी, निषाद, विश्वकर्मा, चौहान आदि का है। इनके वोटों की तादाद भी 4 लाख के करीब है। सवर्ण मतदाता भी तक़रीबन 3 लाख के आस -पास है। इसमें से अगर 55 प्रतिशत भी उसके पक्ष में मतदान होता है तब सायकिल घोसी से दिल्ली चली जायेगी। लिहाज़ा इंडी और एनडीए का अपना अपना चुनावी फार्मूला है ज़बकि जनता जनार्दन का अपना। अभी 1 जून को मतदान होने है। उसके सामने अगर ओपी राजभर के बेतुके बयान है तो सपा की भी पुरानी कार्य शैली से वो पूरी तरह वाकिफ है। उसके सामने एक मुद्दा, सांसद का उसके बीच बना रहना है। बना रहने के साथ उसकी जनता के लिए उपलब्धता भी काफ़ी अहम है।
इसके साथ ही उसके लिए सबसे बड़ा सवाल महंगाई, भ्रष्टाचार,बेरोजगारी, सुरक्षा का है। शिक्षा पर ,सेहत पर बढ़ता बोझ भी आम जनता के लिए अहम मुद्दा है। सिर्फ़ जातिगत आधार पर चुनाव अब जीतना शायद मुश्किल है। सिर्फ़ कोरी लफ़्फ़ाजी पर भी जनता वोट नहीं देती । ये, जनता ने कई विधानसभा चुनावों में दिखाया भी है। अभी, फ़िलहाल जातिगत गणित और जनता के बीच चुनावी चर्चा में इंडी गठबंधन आगे दिख रहा है। मगर ये, वोट में तब्दील कितना हुआ? 4 जून को पता चलेगा। सबसे बड़ा सवाल राजभर को मिले ताज़ (कैबिनेट मंत्री, उप्र सरकार ) का है। राजनैतिक हलकों में ये कानाफूसी चल रही है किओपी राजभर और दारा सिंह चौहान को मंत्री पद इसलिए मिला है कि इन्हें ये सीट जिता कर एनडीए को देनी है। कहीं ऐसा नहीं हुआ तब चुनाव बाद समीक्षा में मंत्रीपद वाला ताज़ जा भी सकता है। अब देखना ये है कि ओपी राजभर भाजपा के कार्यकर्ताओं, स्थानीय नेताओं को कितना अपने साथ जोड़ सकते है। जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता कितनी बना सकते है। बूथ तक ये कितना वोट अपना निकाल पायें ? 4 जून को ही पता चल पायेगा। फ़िलहाल चुनावी गणित, माहौल बनेंगे, बिगड़ेंगे। अभी उड़न खटोले से ‘ बड़के ‘नेता जी लोगों को आने तो दें!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *