चन्द्रयान : अबकी तो राखी भेजी है, अगली फिर खुद ले आएंगे
@ज्ञानेन्द्र पाण्डेय…
गर चांद नहीं होता मामा, हम जाते किसके घर को।
धरती पर भी उनका कोई अपना है, बतलाते हम फिर किसको।।
मां (धरती) दूर हुई थी उनसे वो, भर रात नहीं सोते थे।
खुली पलक या निदियाये से, उन्हें देख रहे होते थे।।
कब उनका अपना कोई आएगा, ये सोच रहे होते थे।
पहुंचूंगा पहले मैं या बच्चे, जोड़ रहे होते थे।।
कुछ उनके प्यारे बच्चों ने, दो छलांग लगाई गोदी को।
बच्चे छोटे – मामा ऊंचे, नाप ना पाई दूरी तो।।
मामा ने कुछ सीख सिखाई, अपने राज दुलारों को।
सीख साख कर जोख नाप कर, बच्चों ने साधा पैरों को।।
यह राखी मामा को जाएगी, बच्चों ने मन मे ठान लिया।
उनके कंधों पर घूमेंगे, इस ज़िद मे कुछ तो प्लान किया।।
लोगों ने जब ये समझाया, मामा घर दूर बहुत है।
जाएं या फिर ठहरें, पर राखी देने की ज़िद है।।
मामा को राखी भेजी, इस संदेशे के साथ।
अब वो दिन दूर नहीं मामा, जब थामेंगे तेरा हाथ।म
मामा को भी हुई तसल्ली, उनकी बहना है ठीक ठाक।
मैं दूर पर नहीं अकेला हूँ, मेरे अपने हैं आस पास।।
अबकी तो राखी भेजी है, अगली फिर खुद ले आएंगे।
फिर मामा की गोदी बैठ बैठ, बस दूध कटोरी खाएंगे।।

सुंदर प्रयास