रचनाकार

चन्द्रशेखर आज़ाद

शब्द मेरे मीत…
डाक्टर महिमा सिंह
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

सन 1906 तारीख 23 जुलाई ली थी अगड़ाई आदिवासी इलाके में जन्मा था आजादी का दीवाना ।
था वह चन्द्र सा आजाद नाम चन्द्रशेखर आजाद
थे सख्त तेवर बुलंद इरादे
वो रांझा सा करता था इश्क मातृभूमि से।
हृदय मे दहकती थी ज्वाला मातृभूमि की आजादी की
नाम बताते आजाद पिता स्वतंत्रता घर जेल इंकलाब गहना कपड़ा उनका।
वतन पर जहाँ होना कुर्बान है सबसे बड़ा त्यौहार।
थे विरले दिवाने आजादी के वो अंतिम सांस तक बस देखे सपन सलोने अपने वतन की आजादी के।

वतन के लिए खुद से ही प्रतिस्पर्धा करते ,
खुद के ही कीर्तिमान को तोडो इस चिंगारी को लहू से रोज हवा दो ।
भारत माता की दुर्दशा देख लहू तेरा ना खौले तो वो लहू
नहीं है पानी किस काम की फिर तेरी जवानी है।

थी स्वतंत्रता ही उनका पहला धर्म और मर्यादा ।
स्वतंत्रता ही उनका तप।
वही रिश्तेदार वही महबूबा।
ऐसा इश्क विरले ही कर पाते अंतिम सांस तक बस देखें सपन सलोने वतन की आजादी के।
जीवन को यज्ञ वेदी बनाकर सबकुछ मातृभूमि के नाम पर स्वाहा कर जाते।

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