रचनाकार

कुण्डलिया..।

( डाॅ सरला सिंह “स्निग्धा” )

      जीवन...

जीवन यह अनमोल है, करले इसका मोल,
बार-बार मिलता नहीं, खो मत तू बिन तोल।
खो मत तू बिन तोल, चला है व्यर्थ गँवाने।
अपने‌ को भी आज, कहाँ है तू पहचाने।
कहती सरला बात, खिले हैं सुंदर उपवन।
मिले हमें दिन चार,करो तुम मनहर जीवन।।

        उपवन...

ऐसा यह संसार है, उपवन जैसा मान।
तरह तरह के लोग हैं,लगते पुष्प समान।
लगते पुष्प समान, रहो मिलजुलकर भाई।
गाये कोयल गीत, बजे मन में शहनाई।
कहती सरला आज,करो जग को ही वैसा।
आयें दौड़े देव, कहें जग हो बस ऐसा।

डाॅ सरला सिंह “स्निग्धा”
दिल्ली

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