रचनाकार

दो टूक : पारस

@ धीरु भाई (धीरेन्द्र श्रीवास्तव)

कई दिनों से
सोच रहा था
केवल एक शब्द में
सिस्टम का व्यक्तित्व
सिस्टम का कृतित्व
सिस्टम का एलान
सिस्टम का जनकल्यान
सिस्टम का प्यार
सिस्टम का वार
सिस्टम का भ्रष्टाचार
सिस्टम का नरसंहार
कहना हो तो क्या कहें ?

आज गर्व के साथ कह सकता हूँ
हमारे सिस्टम जी ने
उपरोक्त सम्पूर्ण के लिए
एक शब्द दे दिया,
“पारस”।

इस “पारस” को
रोज सुबह प्रणाम करें
इसे देखकर राम राम करें
कि इसकी जद में
आप नहीं आए।

जैसे वह
स्मार्ट सिटी की जगह
शमशान सिटी
रोजी रोटी देने की जगह
लेने के बाद
इतरा रहे हैं
हम लोगों को बता रहे हैं
कि हम हैं
इसलिए कम हुआ
कल्पना करिए
हम नहीं होते तो
क्या होता?
वैसे हमारा “पारस” भी
बता रहा है
“छांट दिया”
का अर्थ ।

जैसे यह
अपराधियों को
ठोंकवा रहे हैं
वैसे हमारा
“पारस” भी
कार्रवाई की मांग कर रहे
प्रदर्शनकारियों को
ठोंकवा दिया
वाह “पारस”
वाह।

हमें पता है
जब तक वह हैं
जब तक यह हैं
तूँ भी रहेगा
और अपने परिजनों को
खो चुका
आम आदमी
तुम्हें देखता रहेगा
यह सुनता रहेगा
कि ऑक्सीजन की कमी से
किसी की मौत नहीं हुई है
इस यकीन के साथ
कि धरती पर
कुछ भी स्थायी नहीं है।

एक बात और पारस ?
कल हम भी नहीं रहेंगे
कल वह भी नहीं रहेंगे
कल यह भी नहीं रहेंगे
कल तूँ भी नहीं रहेगा
रह जाएगा
केवल अर्थ
कि एक पारस
जिसके छूने से
पत्थर सोना होता है
एक पारस
जिसे छूने से
रोना होता है।

  • धीरु भाई
    दो टूक, 9 जून 2021

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