आत्मकथा ! वतन की मिट्टी
( सूबेदार पाण्डेय कवि आत्मानंद )
मैं घर से परदेश चला था, रोजी-रोटी की
तलाश में। रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर मैंने एक सुराही तथा एक मिटृटी का गिलास लिया था , रास्ते में शीतल जल पीने के लिए,और सफ़र कटता गया। मैंने उस सुराही के इस जल से साथ चल रहे सहयात्रियों की प्यास बुझाई थी, मुझे अपने सत्कर्मो पर गर्वानुभूति हो चली थी, मुझे भी जोर की प्यास लगी थी, जैसे ही मैंने पानी से भरे मिट्टी के गिलास को हाथ में उठा होंठों लगाना चाहा तभी वह सिसकती हुई मिट्टी बोल पड़ी थी मै भारत देश की महान धरती के एक अंश से बनी हूं। मैं तुम्हारे वतन की मिट्टी हूं, मेरे संपूर्ण अस्तित्व को अनेकों नामों से संबोधित किया जाता है, मुझे लोग ,धरती, धरणी
वसुंधरा,रत्नगर्भा,महि ,भूमि, आदि न जाने कितने नामों से पुकारते हैं,मैं बार बार राजाओं महाराजाओं की लोलुपता का शिकार हुइ हूं, मुझे प्राप्त करने की इक्षा रखने वाले राजाओ की गृहयुद्ध की साक्षी भी मैं ही हूं,।
,यह उस जमाने की बात है,जब प्लास्टिक का चलन शुरू ही हुआ था लेकिन मिट्टी ने भविष्य में आने वाले खतरे को भांप लिया था ,वह मुझसे संवाद कर उठी थी, उसने कहा ओ परदेशी पहचाना मुझे , मैं तेरे वतन की मिट्टी हूं,जब तूं परदेश के लिए चला था,तभी से मैं तेरा साथ छूटने पर दुखी थी, मैं तुझे इसलिए बुला रही थी, की तुझे अपनी राम कहानी सुना सकूं ,लेकिन तूने मेरी सुनी कहां, लेकिन तूं मेरी वफ़ा को देख, मैंने फिर भी तेरा साथ नहीं छोड़ा और सुराही के रूप में चल पड़ी हूं तेरे साथ तेरी प्यास बुझाने तथा तेरे साथ चल रहे ,इंसान की प्यास बुझाने के लिए। मुझे धरतीखोद कर निकाल कर कुंभार अपने घर लाया,
फिर मुझे रौंदा गया , मुझे रौंदे जाते देख मेरे एक पुत्र कबीर से मेरी दुर्दशा देखी न गई, उन्होंने मुझे माध्यम बना कुंभार को चेतावनी भी दे डाली , और यथार्थ समझाते हुए कहा कि—-
माटी कहे कुम्हार से,तूं कस रौंदे मोहि।
इक दिन ऐसा आयेगा , मैं रौदूगी तोहि।।
लेकिन कुम्हार ने जिद नहीं छोड़ी उसने मुझे आग में तपा दिया और गढ़ दी अनेकों आकृतियां अपनी आवश्यकता के अनुरूप,मैने एक दिन उसे भी अपनी गोद में जगह दे दिया वह सदा के लिए मुझमें समा गया ,लेकिन मेरी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई और मैं दुकान से होती जीवन यात्रा तय करती तुमसे आ टकराई हूं, मैं आशंकित हूं अपने भविष्य के प्रति कि एक दिन तेरा स्वार्थ पूरा होते ही तूं मुझेतोड़ कर फेंक देगा ।काश मैं सुराही न होकर प्लास्टिक कुल में पैदा हुई थर्मस होती, तो यात्रा पूरी करने के बाद भी तेरे घर के कोने में शान से रहती,
याद रख मैं कृत्रिम नहीं हूं, मैं तेरी सभ्यता संस्कृति का वाहक तो हूं ही , मुझसे ही तेरी पहचान भी है, मैं युगों-युगों से देवता और दानव कुल के बीच चल रहे संघर्षों की भी साक्षी रही हूं, मैंने पारिवारिक पृष्ठभूमि के युध्द देखे,आततायियों को धराशाई होते देखा,वीरों को वीरगति को
प्राप्त होते देखा, मैं भी नारी कुल से पैदा
हुई धरती मां का अंश हूं मैंने सीता जैसी कन्या को अपनी कोख से पैदा किया तो
उसकी व्यथा सुनकर अपने आंचल में समेटा भी, मैंने ही जीवन यापन करने के लिए लोगों को फल फूल लकड़ी चारा जडी़ बूटियां खनिज दिया।
मैं न रही तो प्लास्टिक का ढेर तेरी पिंढ़ियों को खा जायेगा,फिर तुझे किसी को पिंडदान करने के लिए भी नहीं छोड़ेगा। हरतरफ करूण क्रंदन ही क्रंदन होगा।
मुझेअपने भविष्य का तो कुछ भी पता नहीं है लेकिन तेरा भविष्य मैं जानती हूं , तूं पैदा हुआ है मेरे सीने पर, खेला भी मेरी गोद में, तूं मरेगा भी मेरी आंचल की छांव में, और चिरनिंद्रा में सोने पर तुझेअपनी गोद में जगह भी मैं ही दूंगी, क्यों कि मैं तेरे वतन की पावन मिट्टी हूं, तुम्हारे ही आदमजात भाईयों ने अपनी लिप्सा पूरी करने के लिए विभाजन कीअनेक सीमा रेखायें खींच दी ,मेरे सीने पे,इसका मुझे दुख और क्षोभ भी हुआ, लेकिन दुसरे बेटे के कर्म पर गर्व भी है मुझे, जिसने मुझे अपने माथे से लगा कर, मेरी आन बान शान की रक्षा मेंअपनी जान देने की कसम खा रखी है।आज भी देश भक्त मेरी मिट्टी से अपने माथे का तिलक लगाकर अपनी जान दे देते हैं उनका जीना भी मेरी खातिर ,मरना भी मेरी खातिर, लेकिन उनका क्या, जो मेरे नाम पर देश का भाग्य विधाता बन अपने अपने सत्ता
सुख के लिए मुद्दो की तलाश में हर बार
विभाजन की एक और लकीर मेरे सीने पर और खींच देते हैं जाति वाद क्षेत्रवाद, भाषा वाद, और अब तो संप्रदाय वाद, के दंश से मै दुखी महसूस कर रही हूं।उन भाग्यविधाताओं से मेरे वे सपूत अच्छे है
जहां जाति धर्म मजहब का कोई भेद नहीं
सच्चीदेशभक्ति प्रजातंत्र के मंदिर में नहीं दिखती वहां अब अपने अपने मतलब के लिए एक दूसरे पर कीचड उछालने का काम होता है मैंने प्रजातंत्र के मंदिर में अवांछित
शब्दों के प्रयोग से लेकर मार पीट भीहोते देखी है,काश कि वहां पर लोक हित चिंतन की बातें होती , जनहित के मुद्दों पर स्वार्थ रहित बहस करते, संसद चलने देते तो मेरी आत्मा निहाल हो जाती जो, प्रजातंत्र की मूल भावना थी ,काश कोई सरहद पे जाता और देखता, जहां बिना जाति धर्म मजहब की परवाह किए मेरा जवान लाल मेरे लिए ही जीता है मेरे लिए ही मरता है तभी तो उनकी जहां चिता जलती है वहां की माटी भी आजपूजी जाती है, तभी तो किसी शायर ने कहा कि—–
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
बतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां
होंगा।।
तभी तो किसी रचना कार ने फूल की इक्षा का चित्रण करते हुए लिखा जो यथार्थ दर्शन कराता है——
मुझे तोड़ लेना बन माली ,उस पथ पर तुम
देना फेंक।
मातृभूमि हित शीष कटाने जिस पथ जायें बीर अनेक।
तभी कोई भोजपुरी रचना कार कह उठता है—–
जवने माटी जनम लिहेस उ,
उ ,माटी भी धन्य हो गइल।
जेहि जगह पे ओकर जरल चिता
काबा काशी उ जगह हो गईल।
भला मेरे सम्मान करने वालों का इससे बढ़िया उदाहरण और कहां !
आम आदमी तो उस मंदिर पहुंचता नहीं ,कि अपने समाज का हितचिंतन कर सके, क्योकि वहां प्रवेश के जिस जनमत रूपी प्रवेश पत्र की आवश्यकता होती है वह उसके पास नहीं होता जहां योग्यता नहीं धनबल और बाहुबल से व्यक्ति की दावेदारी तय होती है।आम आदमी के लिए वह क्षेत्र अभी भी निषिद्ध है जो अमूमन प्रजातंत्र के मंदिर तक पहुंचता ही नहीं,अगर भूले से पहुंचा भी तो सत्तासुख के लोभी षड्यंत्र कर उसे रहने नहीं देंगे।
फिर इन सबके लिए एक मात्र वहीं दोसी क्यों , हमारे अपने बेटे भी तो आंख के अंधे कान के बहरे जुबान से गूंगे है जिन्हें ना मेरी दुर्गति दिखती है ना तो आह सुनाई देती है, टूटी फूटी सड़कें गिरते पड़ते हाथ पांव तुड़ाते लोग हर तरफ घूसखोरी कालाबाजारी मिलावट खोरी ही मेरी पहचान बन कर रह गयी है , फिर भी वो हैं ना इसी बिश्वास भरोसे पर तो जिंदा हूं कि कभी तो भगवान आयेगा आतताइयों के चंगुल से छुड़ाने ,अभी तो प्रजातंत्र के मंदिर में अवांछित तत्वों का दबदबा है,ही कौन जाने इनमें ही कोई माई का लाल छुपा हो मुक्ति दाता बनकर, इसमें कोई किसी से कम भी नहीं! ,और तुम भी उनमें से एक ही हो ,तुम्हारी यात्रा और ज़रूरतें पूरी हो जायेगी, और तुम मुझे कहीं भीउपेक्षित फेंक दोगे ,काश की अपनी जरूरत पूरी कर किसी गरीब जरूरतमंद को दे देते तो मेरा जन्म सुफल हो जाता ।इस तरह संवाद करते करते उसकी आंखें भर आईं थी ,और मेरा दिल भी भर आया था,और मैं मिट्टी का गिलास ओंठो से लगाना भूल गया था।आज मुझे अपने वतन की माटी की पीड़ा कचोट रही थी। तथा अपने वतन की माटी से प्यार हो आया था मुझे।
रचनाकार…
सूबेदार पाण्डेय कवि आत्मानंद
जमसार सिंधोरा वाराणसी पिन
221208
मोबाइल – 6387407266

