रचनाकार

मन के गहरे सागर में …

(अंजु गुप्ता )

मन के गहरे सागर में,
न जाने कितने छुपे हैं राज़ !
गर चाहो तुम, तो बतला दूँ मैं
अहसासों को पिरो “शब्दों” में आज !!

कुछ यादें छुपी हैं… धुंधली सी
कुछ ख्वाब पड़े हैं… बेसुध से
कुछ कही – कुछ अनकही सी बातें
कुछ पड़े हैं… अधूरे से वादे !!

कुछ निशां हैं… भटके कदमों के
इक कोने में बना… मरुस्थल है !
कुछ पायल की… छम-छम के गीत
और उनमें खोई मेरी प्रीत !!

नामुमकिन हैं कि शब्द मिलें
अबोले इन अहसासों को !
रहने दो ! छिपे ही रहने दो
मन में छुपे, दिलों के राज़ !!
मन के गहरे सागर में …

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