ईश भी है मौन … !!
(मान बहादुर सिंह “मानु”)
मैं मरा कई बार …….
नसों से सारा रक्त निचोड़कर
ज़र्द ,सुन्न चेहरे से मरते देखा
अंतिम बच्चे को एक बार !
मैं मरा कई बार …….
जब पाखण्ड के तेज आवाज़ ने
दबा दिया तर्क को बार – बार
मैं मरा कई बार ……..
बनिस्बत उस सरपंच के
जो रोज़ मारता ईश्वरीय अस्तित्व को /
ईश्वर ने मार डाला
एक निश्छल गरीब !
मैं मरा कई बार …
जब दूध पीते मासूम की
माँ मर गई एक दिन !
कर तरफ आकाश के चीखता दिन रात ,
अनसुनी है बात उसकी
ईश भी है मौन … !!


